नववर्ष पर एकादशी का पावन संयोग: संयम, साधना और सदाचार से हो वर्ष का शुभारंभ






त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ****/// कोरबा नववर्ष के शुभ अवसर पर एकादशी का पावन संयोग आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सनातन धर्म में एकादशी को आत्मशुद्धि, संयम और भक्ति का श्रेष्ठ पर्व कहा गया है। ऐसे में नववर्ष की शुरुआत यदि एकादशी के व्रत, पूजा-पाठ और धार्मिक जागरण के साथ हो, तो पूरे वर्ष सकारात्मक ऊर्जा, शांति और सदाचार का प्रभाव बना रहता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी के दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष आराधना करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और मन, वचन व कर्म की शुद्धि होती है। शास्त्रों में इस दिन मांसाहार, मुर्गा, मटन तथा नशे—विशेषकर शराब—से पूर्ण रूप से दूर रहने का स्पष्ट निर्देश दिया गया है। माना जाता है कि नशा और तामसिक भोजन मन को विकारों की ओर ले जाते हैं, जबकि एकादशी का व्रत और सात्त्विक आहार आत्मबल को बढ़ाता है।
धर्माचार्यों का कहना है कि एकादशी केवल उपवास नहीं, बल्कि आत्मसंयम का पर्व है। इस दिन इंद्रियों पर नियंत्रण, क्रोध-लोभ से दूरी और करुणा-सेवा का भाव अपनाना चाहिए। नववर्ष पर एकादशी का आगमन समाज को यह संदेश देता है कि नया साल केवल जश्न और भोग-विलास का नहीं, बल्कि नए संकल्प, शुद्ध आचरण और धर्म के मार्ग पर चलने का अवसर है।
धार्मिक जागरण, भजन-कीर्तन, रामायण या श्रीमद्भागवत का पाठ, विष्णु सहस्रनाम का जप—ये सभी साधन मन को स्थिर करते हैं और परिवार व समाज में सद्भाव बढ़ाते हैं। घर-घर दीप प्रज्वलन, तुलसी पूजन और जरूरतमंदों को अन्नदान करने से पुण्य की वृद्धि होती है।
क्यों नहीं करना चाहिए मांसाहार और नशा?
धार्मिक दृष्टि से यह दिन सात्त्विकता का है। मांसाहार और नशा न केवल व्रत को भंग करते हैं, बल्कि मानसिक अशांति और नकारात्मकता को बढ़ाते हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से भी उपवास और सात्त्विक भोजन शरीर को विश्राम देता है, पाचन तंत्र को सुधारता है और मन को शांत करता है। इसलिए एकादशी पर संयम अपनाना तन-मन दोनों के लिए हितकारी है।
समाज के लिए संदेश
नववर्ष की एकादशी हमें यह सीख देती है कि हम अपनी आदतों की समीक्षा करें, नशे से दूरी बनाएं, अहिंसा और करुणा को अपनाएं तथा पूजा-पाठ और सत्संग के माध्यम से जीवन को दिशा दें। यदि समाज का प्रत्येक व्यक्ति इस दिन संकल्प ले कि वह हिंसा, नशा और असंयम से दूर रहेगा, तो एक स्वस्थ, सशक्त और संस्कारवान समाज का निर्माण संभव है।
अंत में
आइए, इस नववर्ष पर एकादशी के पावन अवसर को केवल परंपरा नहीं, बल्कि आत्मिक जागरण और नैतिक नवचेतना का पर्व बनाएं। संयम, साधना और सेवा के साथ वर्ष की शुरुआत करें—यही सच्चा उत्सव और सच्चा संकल्प है।





