श्रीमद्भागवत कथा का छठवां दिवस: रुक्मिणी हरण से लेकर हल्दी–जयमाला तक, फोगला आश्रम में साकार हुआ श्रीकृष्ण–रुक्मिणी विवाह का दिव्य महोत्सव






भगवान श्रीकृष्ण द्वारा रुक्मिणी का हाथ पकड़कर उद्धार, वैदिक विधि से हल्दी संस्कार और भावविभोर जयमाला के साथ गूंजा राधे–कृष्ण नाम
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा *****//** श्रीधाम वृंदावन।
फोगला आश्रम, श्रीधाम वृंदावन में आयोजित श्रीमद्भागवत महापुराण कथा का छठवां दिवस अत्यंत भव्य, ऐतिहासिक और भावविभोर कर देने वाला रहा। कथा व्यास श्रीहित ललितवल्लभ नागर जी की अमृतवाणी से आज का दिन भगवान श्रीकृष्ण और देवी रुक्मिणी के दिव्य विवाह प्रसंग को समर्पित रहा। आश्रम परिसर “जय श्रीकृष्ण”, “जय रुक्मिणी मैया” और “राधे-राधे” के गगनभेदी जयघोष से गुंजायमान हो उठा।

कथा के दौरान सर्वप्रथम रुक्मिणी हरण का अत्यंत मार्मिक एवं प्रेरणादायक प्रसंग वर्णित किया गया। कथा व्यास ने बताया कि विदर्भ की राजकुमारी रुक्मिणी का विवाह अधर्मी शिशुपाल से बलपूर्वक तय कर दिया गया था। धर्मप्रिय रुक्मिणी ने भगवान श्रीकृष्ण को पत्र भेजकर अपनी व्यथा प्रकट की। भक्त की पुकार सुनकर भगवान श्रीकृष्ण विदर्भ पहुंचे और सभा के मध्य रुक्मिणी का हाथ पकड़कर उन्हें अपने रथ पर बैठाकर अधर्म से मुक्त किया। यह दृश्य सुनते ही श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।

इसके पश्चात कथा में श्रीकृष्ण–रुक्मिणी विवाह पूर्व हल्दी संस्कार का सुंदर वर्णन किया गया। कथा व्यास ने बताया कि हल्दी संस्कार पवित्रता, मंगल और सुख-समृद्धि का प्रतीक होता है। जैसे ही हल्दी रस्म का वर्णन हुआ, आश्रम में उपस्थित श्रद्धालुओं ने इसे सजीव रूप में अनुभव किया। महिलाएं मंगल गीत गुनगुनाने लगीं और वातावरण पूर्णतः विवाह उत्सव में परिवर्तित हो गया।
कथा के क्रम में जब जयमाला का प्रसंग आया, तब संपूर्ण पंडाल तालियों और जयकारों से गूंज उठा। श्रीहित ललितवल्लभ नागर जी ने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण और देवी रुक्मिणी की जयमाला केवल दो आत्माओं का मिलन नहीं, बल्कि धर्म और प्रेम के पवित्र बंधन का प्रतीक है। जयमाला के वर्णन के साथ ही श्रद्धालुओं की आंखें भावनाओं से भर आईं।
कथा व्यास ने कहा कि श्रीकृष्ण–रुक्मिणी विवाह यह संदेश देता है कि सच्चा प्रेम वही है जो धर्म से जुड़ा हो और नारी सम्मान की रक्षा करे। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने पराक्रम, नीति और करुणा से यह सिद्ध किया कि अन्याय चाहे जितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः धर्म की ही विजय होती है।
कथा के दौरान भजन, कीर्तन और हरिनाम संकीर्तन से संपूर्ण फोगला आश्रम भक्तिरस में डूबा रहा। श्रद्धालु झूमते-गाते दिखाई दिए, वहीं कई भक्त श्रीकृष्ण–रुक्मिणी विवाह के प्रसंग को सुनकर भावुक हो गए। आरती के समय वातावरण इतना दिव्य हो गया कि उपस्थित श्रद्धालु स्वयं को द्वारका और विदर्भ की लीला का साक्षी मानने लगे।
कथा के समापन पश्चात श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद का विधिवत वितरण किया गया। आयोजकों ने बताया कि आगामी दिवसों में श्रीमद्भागवत कथा के शेष प्रसंगों में भगवान श्रीकृष्ण की और भी दिव्य लीलाओं, भक्त उद्धार और मोक्षदायी संदेशों का विस्तार से वर्णन किया जाएगा।
श्रीमद्भागवत कथा का यह छठवां दिवस श्रद्धालुओं के लिए केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रेम, नारी सम्मान, धर्म, मर्यादा और सत्य के मार्ग पर चलने की अनुपम प्रेरणा बनकर उभरा। फोगला आश्रम में सजी यह दिव्य विवाह कथा लंबे समय तक श्रद्धालुओं के हृदय में भक्ति और संस्कार की अमिट छाप छोड़ेगी।





