April 23, 2026

त्रिनेत्र टाईम्स

खबरें जरा हट के

“पापमोचिनी एकादशी 2025: पापों से मुक्ति दिलाने वाला व्रत, जानिए तिथि, महत्व और कथा”

त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा *****/ हिंदू पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को “पापमोचिनी एकादशी” के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि इस एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस वर्ष पापमोचिनी एकादशी का व्रत विशेष संयोग में आ रहा है, जिसे “व्यूजंलि महा द्वादशी” के रूप में मनाया जाएगा।

पापमोचिनी एकादशी 2025 की तिथि एवं पारण समय

  • एकादशी तिथि प्रारंभ: 25 मार्च 2025, मंगलवार, प्रातः 05:05 बजे
  • एकादशी तिथि समाप्त: 26 मार्च 2025, बुधवार, प्रातः 03:45 बजे
  • व्यूजंलि महा द्वादशी व्रत तिथि: 26 मार्च 2025, बुधवार
  • पारण (व्रत खोलने का समय): 27 मार्च 2025, गुरुवार, प्रातः 06:20 बजे से 09:43 बजे तक

क्या है “व्यूजंलि महा द्वादशी” का महत्व?

शास्त्रों के अनुसार, जब एकादशी तिथि द्वादशी तक विस्तारित न हो और द्वादशी तिथि त्रयोदशी तक विस्तारित हो, तो इसे “व्यूजंलि महा द्वादशी” कहा जाता है। इस विशेष संयोग में एकादशी के स्थान पर महा द्वादशी का व्रत करने का विधान है, जिससे हजार एकादशियों के समान पुण्यफल प्राप्त होता है।

पापमोचिनी एकादशी का महत्व

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पापमोचिनी एकादशी व्रत के प्रभाव से व्यक्ति को अपने जीवन के सभी पापों से मुक्ति मिलती है। यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी माना जाता है, जो पूर्व में किए गए अनजाने या जानबूझकर किए गए पापों के प्रायश्चित के लिए इसे करते हैं।

पापमोचिनी एकादशी की कथा

इस एकादशी की कथा महाभारत में वर्णित है। जब अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से इस व्रत के बारे में पूछा, तो श्रीकृष्ण ने राजा मान्धाता और महर्षि लोमश के संवाद का उल्लेख किया।

राजा मान्धाता ने ऋषि लोमश से पुछा कि मनुष्य अपने पापों से कैसे मुक्त हो सकता है। ऋषि लोमश ने बताया कि प्राचीन काल में मेधावी नामक ऋषि चैत्ररथ वन में कठोर तपस्या कर रहे थे। उनकी तपस्या को भंग करने के लिए मञ्जुघोषा नामक अप्सरा वहां पहुंची और अपने सौंदर्य एवं संगीत से ऋषि को मोहित कर लिया।

ऋषि मेधावी, अप्सरा के जाल में फंसकर अपना तप भूल गए और 57 वर्षों तक उसके साथ भोग-विलास में लिप्त रहे, परंतु उन्हें समय का भान तक नहीं हुआ। जब उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ, तो उन्होंने क्रोधित होकर मञ्जुघोषा को पिशाचिनी बनने का श्राप दे दिया।

मञ्जुघोषा ने इस श्राप से मुक्ति का उपाय पूछा, तो ऋषि मेधावी ने उसे पापमोचिनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। इस व्रत को करने से मञ्जुघोषा को अपने श्राप से मुक्ति मिली और वह पुनः अप्सरा के रूप में स्वर्ग लौट गई।

महर्षि मेधावी स्वयं भी इस पाप से मुक्ति पाने के लिए अपने पिता च्यवन ऋषि के पास गए। उन्होंने भी उन्हें पापमोचिनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। व्रत का पालन करने से महर्षि मेधावी के सभी पाप नष्ट हो गए और उन्हें पुनः अपना तेज प्राप्त हुआ।

पापमोचिनी एकादशी का पुण्यफल

  • इस व्रत से पूर्व जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं
  • यह ब्रह्म हत्या, स्वर्ण चोरी, मद्यपान जैसे महापापों से भी मुक्ति दिलाने में सक्षम है।
  • इस व्रत के प्रभाव से स्वर्ग की प्राप्ति होती है
  • इस कथा को पढ़ने या सुनने से हजार गौदान के बराबर पुण्यफल मिलता है।

व्रत विधि

  1. प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु का ध्यान करें।
  2. व्रत का संकल्प लेकर दिनभर निर्जला या फलाहार उपवास करें।
  3. श्रीहरि विष्णु के समक्ष दीप जलाएं, तुलसी पत्र अर्पित करें और मंत्र जाप करें
  4. शाम को भगवान विष्णु की आरती करें और भोग लगाएं
  5. अगले दिन ब्राह्मणों को भोजन कराकर, दान देकर पारण करें

निष्कर्ष

पापमोचिनी एकादशी का व्रत जीवन में सकारात्मकता लाने, पापों से मुक्ति पाने और मोक्ष प्राप्ति के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इस वर्ष व्यूजंलि महा द्वादशी के दुर्लभ संयोग में किया गया यह व्रत हजार एकादशियों के समान फलदायी होगा।

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”

(लेख: नाड़ीवैद्य डॉ. नागेंद्र नारायण शर्मा)

More Stories

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed

Copyright © All rights reserved. | Newsphere by AF themes.