August 15, 2026

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मार्गशीर्ष मास में अपनाएं यह आहार-विहार, नाड़ीवैद्य डॉ. नागेन्द्र शर्मा की आयुर्वेदिक सलाह

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जीरे से करें परहेज, शहद और वसायुक्त भोजन रहेगा लाभकारी

 त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ****कोरबा, 06 नवम्बर 2025।
हिन्दू पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष (अगहन) मास का आरंभ 6 नवम्बर से हो गया है, जो 4 दिसम्बर 2025 तक रहेगा। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ प्रांत के ख्यातिलब्ध आयुर्वेद चिकित्सक एवं नाड़ीवैद्य डॉ. नागेन्द्र नारायण शर्मा ने इस महीने के दौरान अपनाए जाने वाले आहार-विहार पर विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि आयुर्वेद में प्रत्येक माह और ऋतु के अनुसार आहार-विहार का वर्णन किया गया है। मार्गशीर्ष मास हेमंत ऋतु का अंग है, जो शक्ति संचय और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का उपयुक्त समय माना गया है।

डॉ. शर्मा ने बताया कि इस मास में शीतल हवाओं के प्रभाव से वात और कफ दोष का प्रकोप बढ़ता है, जिससे संधिशूल, संधिशोथ, श्वास-कास, प्रतिश्याय (सर्दी-जुकाम), वातश्लेष्मिक ज्वर तथा त्वचा रोगों की संभावना अधिक रहती है। इस समय शरीर की जठराग्नि तीव्र होती है, जिससे पाचन शक्ति अच्छी रहती है। अतः शरीर को ऊर्जा देने वाले स्निग्ध, अम्ल और लवण रस युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन करना चाहिए।

उन्होंने चेतावनी दी कि इस माह में जीरे का सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह वात को बढ़ाता है और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ उत्पन्न कर सकता है। इसके विपरीत, वसायुक्त भोजन तथा शहद का सेवन अत्यंत लाभकारी रहता है। डॉ. शर्मा ने यह भी बताया कि यह मास च्यवनप्राश, अश्वगंधा, आंवला, और शतावर जैसे आयुर्वेदिक रसायनों के सेवन का सर्वोत्तम समय है, जिससे पूरे वर्ष के लिए शरीर में शक्ति और रोग प्रतिरोधक क्षमता का संचार होता है।

आहार संबंधी सुझाव:
क्या खाएँ: बाजरा, मक्का, गाजर, मूली, अदरक, सूखा नारियल, सोंठ, मधुर रस युक्त, स्निग्ध और वसायुक्त पौष्टिक खाद्य पदार्थ।
क्या न खाएँ: जीरा, इमली, मोंठ दाल, ककड़ी, खरबूज, तरबूज, कटु, तिक्त या कषाय रस युक्त शीत एवं रुक्ष भोजन।

विहार संबंधी सुझाव:
क्या करें: अभ्यंग (तेल मालिश), आतप स्नान (धूप सेवन), हल्के गुनगुने पानी से स्नान, यथाशक्ति व्यायाम एवं शरीर को ढककर रखना।
क्या न करें: दिन में सोना, रात्रि में देर तक जागना, ठंडे पेय पदार्थों का सेवन, भूखे रहना, अत्यधिक हवाओं के संपर्क में रहना एवं नपा-तुला भोजन न करना।

डॉ. शर्मा ने कहा कि “आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से यह समय शरीर को मजबूत करने, रोगों से बचाव करने और संचित शक्ति से वर्षभर स्वस्थ रहने का अवसर है। यदि हम आहार-विहार को ऋतु और मास के अनुरूप अपनाएं तो आयुर्वेदिक पद्धति से जीवन को अधिक संतुलित और दीर्घायु बनाया जा सकता है।”

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