दलालों और दागी अधिकारियों की मिलीभगत? — पुश्तैनी 3.28 एकड़ भूमि ‘शासकीय’ दर्ज कर बेची जा रही है, कोरबा निवासी ने कलेक्टर से तुरंत बचाव की गुहार लगाई


त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ****/ कोरबा: ग्राम दादर खुर्द, तहसील व जिला कोरबा के निवासी शत्रुघ्न सिंह राजपूत ने आरोप लगाया है कि उनकी पुश्तैनी 3.28 एकड़ जमीन को दलालों और भ्रष्ट राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत से गलत तरीके से “शासकीय भूमि” बताकर सरकारी मद में दर्ज कर लिया गया और उसे टुकड़ों में बेचा जा रहा है। राजपूत ने इस संबंध में कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक, एसडीएम, तहसीलदार तथा अन्य राजस्व अधिकारियों को लिखित शिकायत सौंपते हुए तत्काल प्रशासनिक एवं पुलिसी हस्तक्षेप की मांग की है।
जमीन के दस्तावेज़ और पारिवारिक कब्ज़ा — आवेदक का दावा
आवेदक का कहना है कि उक्त भूमि उनके पूर्वजों के नाम से 1956 से है। जमीन के विवरण इस प्रकार हैं:
खसरा 327/1 — 0.36 एकड़
खसरा 328/1 — 1.76 एकड़
खसरा 338/1 — 0.76 एकड़
खसरा 339/1 — 0.40 एकड़
कुल — 3.28 एकड़।
राजपूत ने कहा कि इन पर रजिस्ट्री अनुबंध, ऋण पुस्तिका, अधिकार अभिलेख व वर्ष 1974 तक का खसरा-B1 जैसे दस्तावेज़ उनके नाम पर मौजूद हैं और परिवार का वास्तविक कब्ज़ा व उपयोग भी इन जमीनों पर रहा है।
बंदोबस्ती सर्वे में गड़बड़ी — ‘अनुपस्थिति’ का फायदा उठाया गया
राजपूत ने आरोप लगाया कि बंदोबस्त सर्वे के समय उनकी अनुपस्थिति का फायदा उठा कर उनकी जमीन को गलत तरीके से सरकारी खाते में दर्ज कर लिया गया। उन्होंने बताया कि इस त्रुटि को सुधारने के लिए उन्होंने छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 89 के तहत प्रकरण दायर किया है, जो वर्तमान में माननीय एसडीएम, कोरबा के समक्ष लंबित है। उन्होंने यह भी कहा कि उच्च न्यायालय ने पहले आदेश दिया था कि भूमि को यथास्थिति में आवेदक के नाम दर्ज किया जाए, परंतु विभागीय स्तर पर इस आदेश का पालन नहीं किया जा रहा है।
पटवारी व तहसीलदार पर गंभीर आरोप, बोर्ड लगाना भी आरोपों में शामिल
राजपूत ने आरोप लगाया कि नए तहसीलदार और पटवारी ने बिना किसी सीमांकन या वैधानिक प्रक्रिया के 28 अक्टूबर को उनकी निजी जमीन पर ‘शासकीय भूमि’ का बोर्ड लगा दिया — जिसे वे पूरी तरह अवैध और मनमानी करार देते हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि जब उन्होंने इस रजिस्ट्रेशन व बोर्ड के खिलाफ आवाज उठायी तो जमीन दलालों ने उन्हें गाली-गलौज और जान से मारने की धमकियाँ दीं।

आवेदक की मांगें — प्रशासन से तत्काल कार्रवाई की अपील
शत्रुघ्न सिंह राजपूत ने प्रशासन से निम्नलिखित कदम उठाने की मांग की है:
भूमि पर हो रहे किसी भी तरह के अवैध कब्जे को तत्काल रोका जाए।
दलालों द्वारा की जा रही खरीदी-बिक्री पर तत्काल रोक लगाई जाए।
पटवारी एवं संबंधित राजस्व अधिकारियों की भूमिका की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।
उच्च न्यायालय के आदेश का पालन सुनिश्चित करते हुए भूमि से “शासकीय भूमि” का बोर्ड हटाया जाए और भूमि को यथास्थिति आवेदक के नाम दर्ज किया जाए।
आवेदक का दृढ़ संकल्प — “अंतिम सांस तक अपनी जमीन की रक्षा करूंगा”
राजपूत ने भावुकतापूर्ण शब्दों में कहा — “यह भूमि मेरे और मेरे बच्चों के जीवन-यापन का अंतिम सहारा है। जब तक शासन यह स्पष्ट नहीं करता कि मेरी भूमि किस सीमा में है और किस आधार पर शासकीय घोषित की गई, मैं इसे नहीं छोड़ूंगा। आवश्यकता पड़ी तो अपनी अंतिम सांस भी इसी भूमि पर लूंगा।” यह बयान स्थानीय आक्रोश और भय दोनों को दर्शाता है।
क्या कहता है प्रशासन? — जवाबदेही की उम्मीद
आवेदक ने कलेक्टर और जिला प्रशासन से शीघ्रता से हस्तक्षेप कर स्थिति का सत्यापन व जांच कराने का अनुरोध किया है। स्थानीय स्तर पर भी यह मामला गरमाए हुए हालात और संभावित सामाजिक तनाव का कारण बन सकता है — यदि जमीन पर बलपूर्वक कब्जा या अवैध बिक्री जैसी कार्रवाइयां जारी रहीं तो स्थिति बढ़ सकती है।
टिप्पणी — आरोपों की स्वीकृति नहीं, पर जांच आवश्यक
यह लेख आवेदक द्वारा प्रस्तुत किए गए आरोपों और दावों का संक्षिप्त, आक्रामक और तटस्थ रूप में संकलन है। उपर्युक्त आरोपों का सत्यापन केवल आधिकारिक जांच के माध्यम से संभव है। इसलिए जिला प्रशासन, राजस्व विभाग और पुलिस से अपेक्षा है कि वे उच्च न्यायालय के निर्देशों का पालन सुनिश्चित करते हुए त्वरित, पारदर्शी और निष्पक्ष जांच कराकर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करें और जमीन के वैधानिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करें।

