करम पर्व पर उमड़ा उरांव समाज का आस्था व संस्कृति का सैलाब — रातभर चला नृत्य-गान, अतिथियों ने की आदिवासी परंपरा की सराहना






त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ****/ कोरबा, 08 सितंबर 2025) — कुडुख (उरांव) समाज द्वारा अपने आदि गुरु एवं आराध्य भगवान महादेव-पार्वती की उपासना के पावन पर्व ‘करम पूजा’ का भव्य आयोजन हर्षोल्लास एवं पारंपरिक श्रद्धा के साथ किया गया। परंपरा के अनुसार करम पेड़ की तीन डालों की विधि-विधान से स्थापना कर रात भर करम देव की आराधना, नृत्य और गीतों के माध्यम से प्रकृति पूजा का अद्भुत दृश्य देखने को मिला।

करम पर्व आदिवासी समाज में प्रकृति के प्रति आस्था, सत्य के मार्ग पर चलने, अच्छाई को अपनाने और बुराई से दूर रहने का प्रेरणादायी पर्व माना जाता है। यह पर्व प्रतिवर्ष भादो एकादशी से लेकर दशहरा और दीपावली के बीच मनाया जाता है। इस दिन कुंवारी कन्याएं अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु करम देव एवं भगवान महादेव-पार्वती को प्रसन्न करने के लिए उपवास रखती हैं।

🌿 आदिवासी शक्तिपीठ कोरबा में हुआ आयोजन — विभिन्न राज्यों से प्रतिनिधियों की उपस्थिति
इस अवसर पर आदिवासी शक्तिपीठ के संरक्षक मोहन सिंह प्रधान, उपाध्यक्ष निर्मल सिंह राज, संगठन प्रमुख रमेश सिरका सहित जशपुर, झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश एवं कोरबा जिले के विभिन्न उपनगरों से भारी संख्या में उरांव समाज के प्रतिनिधि, मातृशक्ति, पितृशक्ति एवं युवाशक्ति उपस्थित रही।
कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों के स्वागत व पूजन से हुआ। तत्पश्चात सभी ने परंपरागत विधि से करम पूजा में भाग लिया।
🪔 “आदिवासी संस्कृति ही विश्व संस्कृति की जननी” — मोहन सिंह प्रधान
संरक्षक मोहन सिंह प्रधान ने अपने उद्बोधन में कहा —
“आदिवासी संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन एवं पुरातन संस्कृति है। इस संस्कृति ने विश्व को एक नई व्यवस्था दी है। हजारों-करोड़ों वर्ष पुरानी परंपराएं आज भी जीवंत हैं, लेकिन आदिवासी समाज को उसका उचित स्थान आज तक नहीं मिला। देश के इंफ्रास्ट्रक्चर और उद्योगों की नींव आदिवासियों की भूमि पर टिकी है, फिर भी यह समाज अपने हक और हकूक के लिए सड़कों पर संघर्ष कर रहा है, यह दुर्भाग्यपूर्ण है।”
उन्होंने आगे कहा कि आदिवासी समाज न तो आस्तिक है न नास्तिक, बल्कि वास्तविकता और वैज्ञानिक तर्कों पर आधारित आस्था रखता है। आज विभिन्न रूपों में आदिवासियों की धार्मिक पहचान को मिटाने की साजिशें चल रही हैं, इसलिए समाज को अपनी परंपरा और पहचान को संरक्षित रखने के लिए सजग रहना होगा।
“हमारी विशिष्ट जीवनशैली ही हमारी पहचान है। आदिवासी संस्कृति ही विश्व संस्कृति की जननी है।” — मोहन सिंह प्रधान
✍ निर्मल सिंह राज व अन्य वक्ताओं ने की एकता की अपील
उपाध्यक्ष निर्मल सिंह राज ने अपने संबोधन में कहा कि आदिवासी समाज को वैचारिक रूप से मजबूत रहते हुए धार्मिक व सांस्कृतिक आधार पर एकजुट रहना होगा। उन्होंने सभी को इस भव्य आयोजन के लिए शुभकामनाएं दीं।
कार्यक्रम में झारखंड, ओडिशा और मध्य प्रदेश से आए प्रतिनिधियों ने भी अपने विचार साझा किए और करम पर्व की महत्ता पर प्रकाश डाला।
💃 मांदर की थाप पर गूंजा करम गीत — रातभर चला नृत्य
कार्यक्रम का संचालन नंदू भगत ने किया। आयोजन की सफलता में सुभाष चंद्र भगत, वासुदेव भगत सहित महिला पदाधिकारियों और समाज के वरिष्ठजनों का विशेष सहयोग रहा।
मांदर की थाप पर सामूहिक नृत्य और भगवान शिव-पार्वती की स्तुति के गीतों से वातावरण भक्तिमय हो गया। पूरा उरांव समाज उल्लास और आध्यात्मिकता से सराबोर रहा।
🏛 महापौर संजू देवी राजपूत ने की पूजा
कार्यक्रम में कुछ समय के लिए नगर पालिका निगम कोरबा की महापौर श्रीमती संजू देवी राजपूत भी उपस्थित रहीं। उन्होंने करम देव की पूजा-अर्चना कर समाज को शुभकामनाएं प्रेषित कीं।
🙏 अंत में धन्यवाद ज्ञापन
कार्यक्रम का समापन सुभाष चंद्र भगत के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। उन्होंने सभी अतिथियों, प्रतिनिधियों और समाज के सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त किया।
📌 संरक्षक:
मोहन सिंह प्रधान
विश्व के प्रथम आदिवासी शक्तिपीठ, कोरबा





