August 15, 2026

त्रिनेत्र टाईम्स

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पितृपक्ष क्यों मनाया जाता है और इसे विधिपूर्वक कैसे किया जाता है – 15 दिनों का पूर्ण विधान

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त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ****/ पितृपक्ष को संस्कृत में “श्राद्ध पक्ष” भी कहा जाता है। यह हिन्दू धर्म के महत्वपूर्ण पर्वों में से एक है, जो विशेष रूप से अपने पूर्वजों (पितरों) की आत्मा की शांति और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए मनाया जाता है। पितृपक्ष का मुख्य उद्देश्य पितरों की तृप्ति करना, उनके प्रति श्रद्धा अर्पित करना और उनके आशीर्वाद प्राप्त करना है।
🌼 पितृपक्ष मनाने का महत्व
पितृपक्ष का आयोजन श्राद्ध कर्म के रूप में किया जाता है। पौराणिक मान्यता अनुसार, जिन पितरों का सही समय पर श्राद्ध नहीं हुआ, वे इस समय अन्न, जल, पिण्डदान आदि ग्रहण करते हैं। यदि यह कर्तव्य नहीं निभाया जाता तो यह माना जाता है कि पितृ अप्रसन्न हो सकते हैं और परिवार में दुःख-समस्या आती रहती है। अतः इस पर्व का उद्देश्य पितरों का आशीर्वाद प्राप्त करना और उनका स्मरण करके उन्हें तृप्त करना है।
📅 पितृपक्ष का काल (15 दिन)
पितृपक्ष आमतौर पर भाद्रपद माह (सितंबर-अक्टूबर) में आता है। यह पक्ष अमावस्या से पूर्णिमा तक चलता है, कुल मिलाकर 15 दिन होते हैं।
प्रारंभ: पितृपक्ष की शुरुआत भाद्रपद शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से होती है।
समाप्ति: पूर्णिमा को पितृपक्ष समाप्त होता है।
✅ पितृपक्ष मनाने की विधि (पूरे विधान के अनुसार)
1️⃣ पितृपक्ष प्रारंभ से पूर्व तैयारी
घर की साफ-सफाई करें।
यथोचित स्थान पर पवित्र स्थान का निर्माण करें।
पितरों के नाम, वंश आदि की सूची बनाकर तैयार रखें।
पूजा स्थल पर गंगा जल, तिल, अक्षत (चावल), पुष्प, दीपक, पंचामृत आदि रख लें।
2️⃣ पितृपक्ष में किए जाने वाले मुख्य अनुष्ठान
🔸 प्रथम दिन – विधिपूर्वक पूजन
घर की पूर्व दिशा में पितरों के लिए एक पवित्र स्थान बनाएं।
उन्हें ध्यान में रखकर विधिपूर्वक दीपक जलाएं, तिल चढ़ाएं और उनके नाम का उच्चारण करें।
मंत्रों का जाप करें –
मुख्य मंत्र – “ॐ पित्रो नमः”
“Om Namo Narayanaya” इत्यादि।
🔸 पिण्डदान (अन्नदान)
प्रत्येक दिन पितरों के लिए तिल, चावल, गंगा जल, पुष्प और पिंड (गोमती चक्र से बने गोले या खीर) दान करें।
पिण्डदान विशेष रूप से अमावस्या को अत्यंत पुण्य माना जाता है।

 

 

🔸 तिल का विशेष महत्व
तिल का दान पितृ संतुष्टि के लिए आवश्यक माना जाता है।
हर दिन तिल मिलाकर पिण्ड बनाकर उन्हें अर्पित करें।
🔸 पानी और भोजन का दान
पितृ पक्ष में विशेष रूप से पेड़, गाय, ब्राह्मण और गरीबों को भोजन कराना पुण्यदायक माना जाता है।
पवित्र नदियों में तर्पण (पिण्ड और जल अर्पित करना) किया जाता है।
🔸 पंचामृत से स्नान और पूजा
प्रतिदिन पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से स्नान करें और स्वयं को पवित्र करें।
फिर पितृपक्ष की पूजा विधिपूर्वक करें।
🔸 व्रत (उपवास)
कई लोग पितृपक्ष के दौरान एक दिन व्रत रखते हैं।
ब्राह्मणों को आह्वान करके भोजन कराते हैं।
3️⃣ अमावस्या (पितृपक्ष का मुख्य दिन)
इस दिन विशेष रूप से तर्पण किया जाता है।
पितरों के नाम उच्चारण के साथ पिंडदान और जल अर्पित किया जाता है।
समस्त विधि और मंत्रों का सही पालन आवश्यक।
4️⃣ समापन (पूर्णिमा)
पूर्णिमा को पितृपक्ष समाप्ति के रूप में मनाई जाती है।
इस दिन ब्राह्मणों को भोजन कराना, प्रसाद वितरण आदि करके विधिपूर्वक समापन किया जाता है।
📜 महत्वपूर्ण बातें जो ध्यान में रखें
शुद्ध मन और शुद्ध स्थान पर अनुष्ठान करें।
ब्राह्मणों को सम्मानपूर्वक भोजन कराना अत्यंत पुण्य माना जाता है।
अनाज, तिल, जल, पिंड, पुष्प का दान इस समय विशेष प्रभावशाली माना जाता है।
प्रत्येक कर्म विधिपूर्वक करें।
गुरु, पितरों और देवताओं का स्मरण करें।
🌸 निष्कर्ष
पितृपक्ष का पालन न केवल पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि यह परिवार की समृद्धि, सुख-शांति और संतुलन बनाये रखने का भी साधन है। विधिपूर्वक किए गए अनुष्ठान से पितरों को तृप्ति मिलती है और आशीर्वाद स्वरूप सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।
यह 15 दिन का महापर्व हर हिंदू परिवार में नियमित रूप से मनाया जाना चाहिए।
🙏🏻 पितृपक्ष में संयमित व पवित्र भावना से अनुष्ठान करें, ताकि पितृ प्रसन्न होकर आपके परिवार को सुख-समृद्धि प्रदान करें।

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