August 16, 2026

त्रिनेत्र टाईम्स

खबरें जरा हट के

चार साल बाद गांव जवाली में गूंजा भोजली पर्व का उल्लास, परंपरा को पुनर्जीवित करने महिलाओं की विशेष भूमिका

1 min read

त्रिनेत्र टाइम्स जवाली। चार वर्ष के लंबे अंतराल के बाद ग्राम जवाली में छत्तीसगढ़ की पारंपरिक सांस्कृतिक धरोहर भोजली पर्व का आयोजन पूरे हर्षोल्लास और भव्यता के साथ किया गया। यह पर्व न केवल मित्रता का प्रतीक है बल्कि किसानों की समृद्धि और अच्छी फसल की कामना का भी द्योतक है। आयोजन में ग्रामवासी, विशेषकर महिलाएं, पूरे उत्साह से शामिल हुईं, जिससे गांव में सुख-शांति, समृद्धि और सामाजिक सौहार्द का वातावरण निर्मित हुआ।

भोजली पर्व का ऐतिहासिक संदर्भ
ग्राम के बुजुर्गों के अनुसार, भोजली पर्व की शुरुआत गांव की जमींदार ठाकुर पारा के परिवार से मानी जाती है, जहां घर की महिलाएं भोजली माता की स्थापना कर 11 दिनों तक सेवा-भाव और भजन-कीर्तन करती थीं। समय के साथ उचित नेतृत्व के अभाव में यह परंपरा धीमी पड़ गई, लेकिन इस बार इसे पुनर्जीवित करने हेतु ठाकुर पारा और ठाकुर देव चौक में भव्य आयोजन किया गया।

भोजली स्थापना से विसर्जन तक
पर्व की शुरुआत भगवान शिव मंदिर, मुरई कछार से हुई, जहां नाग पंचमी के दिन गुड्डाराम कुम्हार के घर में भोजली बोई गई। ठाकुर देव चौक में खाले पारा की बहनों ने भोजली माता की सेवा पूरे श्रद्धा-भाव के साथ की। भोजली विसर्जन से पूर्व रात्रि में महिलाओं ने देर रात तक भजन-कीर्तन किया।

विसर्जन के दिन दोपहर से एन.के. डीजे की धुन और पारंपरिक लोकगीत “देवी गंगा, देवी गंगा लहर तुरंगा…” की गूंज के बीच महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में सजी, अपने-अपने पात्र सिर पर रखकर शोभायात्रा में शामिल हुईं। यात्रा गांव के प्रमुख देवस्थलों से होती हुई विसर्जन स्थल तक पहुंची। युवाओं ने भी सुरक्षा और व्यवस्था संभालने में सक्रिय भूमिका निभाई।

सामुदायिक सहयोग और प्रसाद वितरण
ग्राम सरपंच दिलेश कुमार कंवर और जनपद सदस्य कमल बेलदार ने प्रसाद हेतु रसद सामग्री प्रदान कर आयोजन का उत्साह बढ़ाया। समिति के प्रमुख सदस्यों मनोज, गोपाल, सूरज, विनीत, पुरुषोत्तम, हर्ष, दीपक पटेल आदि ने मिलकर कार्यक्रम का सफल संचालन किया। भोजली विसर्जन के बाद सिंघाली मोड़ तिराहा स्थित हीरा सिंह कंपलेक्स के सामने खिचड़ी प्रसाद का वितरण किया गया।

क्षेत्र में व्यापक उत्सव का माहौल
भोजली पर्व का उल्लास केवल जवाली तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कोरबा, कटघोरा, पाली, दीपका, हरदीबाजार, बरपाली, जटगा, तूमान, चैतमा, जरार्ली और आसपास के गांवों में भी यह पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। धार्मिक आस्था, सामाजिक एकता और हरियाली की कामना का यह अद्भुत संगम छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत की झलक पेश करता है।

More Stories

1 min read

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed

1 min read
Copyright © All rights reserved. | Newsphere by AF themes.