वरूथिनी एकादशी 2025: भगवान विष्णु की कृपा से पुनः मिला जीवन, जानिए व्रत की तिथि, पारण समय व पौराणिक कथा



।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।।
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा। ****/ वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरूथिनी एकादशी के रूप में मनाया जाता है। यह पावन तिथि इस वर्ष 23 अप्रैल 2025, बुधवार को सायं 04:43 बजे प्रारंभ होकर 24 अप्रैल 2025, गुरुवार को दोपहर 02:32 बजे समाप्त होगी। उदयातिथि के अनुसार वरूथिनी एकादशी का व्रत 24 अप्रैल को गुरुवार के दिन श्रद्धा और विधिपूर्वक रखा जाएगा।
व्रत के पारण (उपवास समाप्ति) का समय 25 अप्रैल 2025, शुक्रवार को प्रातः 05:46 बजे से 08:23 बजे तक रहेगा।
वरूथिनी एकादशी का महत्व एवं व्रत कथा:
धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा भगवान श्रीकृष्ण से एकादशी के महत्व की जिज्ञासा व्यक्त करने पर भगवान श्रीकृष्ण ने वैशाख कृष्ण एकादशी के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि यह एकादशी मनुष्य के पापों का नाश करने वाली एवं जीवन में शुभता प्रदान करने वाली होती है।
प्राचीन काल में मान्धाता नामक एक परम धार्मिक राजा थे। वे सदैव भगवान विष्णु की उपासना में लीन रहते थे। एक बार जब वे जंगल में तपस्या कर रहे थे, तभी एक भालू आकर उनके पैर को काटने लगा और घसीटते हुए ले जाने का प्रयास करने लगा। राजा ने बहुत प्रयास किया लेकिन स्वयं को छुड़ा नहीं सके। अंततः उन्होंने भगवान विष्णु का स्मरण किया। उनकी पुकार सुनकर भगवान विष्णु प्रकट हुए और अपने चक्र से भालू का वध कर दिया। लेकिन तब तक भालू राजा का एक पैर खा चुका था।
इससे दुखी होकर राजा ने पुनः भगवान से प्रार्थना की। तब भगवान विष्णु ने उन्हें मथुरा जाकर वरूथिनी एकादशी का व्रत रखने और वराह अवतार की पूजा करने का परामर्श दिया। भगवान ने यह भी बताया कि भालू द्वारा किया गया आक्रमण उनके पूर्व जन्म के कर्मों का परिणाम था। राजा ने श्रद्धा से व्रत किया और भगवान की कृपा से उन्हें पुनः उनका खोया हुआ पैर प्राप्त हुआ।
इस व्रत को करने से शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक बल की प्राप्ति होती है। यह व्रत पुण्य, आरोग्य और समृद्धि देने वाला माना गया है।
नाड़ीवैद्य डॉ. नागेंद्र नारायण शर्मा ने इस व्रत के महत्व को बताते हुए श्रद्धालुओं से आह्वान किया है कि वे इस पवित्र एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करें और व्रत का पालन कर पुण्य लाभ अर्जित करें।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वरूथिनी एकादशी का व्रत विशेष फलदायक होता है और यह व्रत भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ साधन माना गया है।


