दीपका में फूटा मजदूरों का लावा — बोनस घोटाले पर SECL प्रबंधन घिरा, “हक़ दो वरना ट्रांसपोर्ट ठप!” की चेतावनी






त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ***/ दीपका (कोरबा), 16 अक्टूबर 2025।
दीपावली की चमक से पहले दीपका में ठेका मजदूरों के भीतर वर्षों से सुलग रहा गुस्सा आज फट पड़ा। दक्षिण पूर्वी कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) के मुख्य महाप्रबंधक कार्यालय के बाहर शुक्रवार को सैकड़ों मजदूरों ने बोनस और वेतन की मांग को लेकर जोरदार प्रदर्शन किया। “बोनस दो — हक दो!”, “प्रबंधन होश में आओ!” और “अब की दीपावली न्याय की होगी!” जैसे नारों से पूरा परिसर गूंज उठा।
कोयला मजदूर पंचायत के बैनर तले एकजुट हुए मजदूरों ने SECL दीपका प्रबंधन पर सीधा निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि बोनस वितरण के नाम पर सुनियोजित ढंग से मजदूरों से धोखा किया जा रहा है। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि दीवाली आने को है, लेकिन ठेका कंपनियों और प्रबंधन की मिलीभगत से बोनस अब तक मजदूरों की जेब तक नहीं पहुंचा है।
“कागज़ों में मंज़ूर, जेब तक नहीं पहुँचा बोनस” — मजदूरों का आरोप
मजदूरों ने बताया कि प्रदर्शन आधारित PLI बोनस को कागज़ों में मंज़ूर कर दिया गया, लेकिन इसका कोई अता-पता ज़मीनी स्तर पर नहीं है। कई मजदूरों को तीन-तीन महीने से वेतन तक नहीं मिला है।
एक प्रदर्शनकारी ने गुस्से से कहा —
“हम दिन-रात कोयला ढोते हैं, लेकिन जब अपना हक़ मांगते हैं तो गेट पर घंटों धूप में खड़ा कर दिया जाता है। यह अन्याय नहीं तो और क्या है?”
“बोनस रोकने की साजिश प्रबंधन के संरक्षण में” — कोयला मजदूर पंचायत
कोयला मजदूर पंचायत के प्रतिनिधियों ने कहा कि ठेका कंपनियां बोनस देने से बचने की कोशिश कर रही हैं, और SECL प्रबंधन इसके पीछे संरक्षक की भूमिका निभा रहा है।
संगठन ने स्पष्ट कहा —
“महाप्रबंधक के पास पूरा अधिकार है कि ठेकेदारों के बिल से बोनस की रकम काटकर सीधे मजदूरों को दी जाए, लेकिन दीपका में ऐसा नहीं हो रहा। इससे साफ है कि प्रबंधन स्वयं नहीं चाहता कि मजदूरों को उनका हक़ मिले।”
राजनीति के घेरे में फंसा दीपका का बोनस विवाद
स्थानीय सूत्रों ने बताया कि दीपका में बोनस वितरण अब केवल प्रशासनिक मामला नहीं, बल्कि “दबाव की राजनीति” का हिस्सा बन चुका है। हर साल दीपावली से पहले बोनस रोकना और बाद में “मनमानी रकम” देकर मजदूरों को शांत करना, यह एक परंपरा बन गई है।
इस बार मजदूरों ने साफ चेतावनी दी है —
“जब तक पूरा बोनस नहीं मिलेगा, तब तक कोई गाड़ी नहीं चलेगी। 48 घंटे में भुगतान नहीं हुआ तो कोयला परिवहन ठप कर दिया जाएगा, और इसकी जिम्मेदारी पूरी तरह प्रबंधन की होगी।”
प्रबंधन की चुप्पी पर और भड़का जनाक्रोश
प्रदर्शन के दौरान कोई वरिष्ठ अधिकारी स्थल पर नहीं पहुँचा।
स्थानीय अधिकारी ने मात्र इतना कहा कि “यह मामला ठेकेदार कंपनी का है।”
इस बयान ने मजदूरों के गुस्से में और आग भर दी।
स्थानीय नागरिकों ने भी मजदूरों के साथ एकजुटता दिखाई और कहा कि SECL दीपका प्रबंधन “कागज़ी संवेदना” दिखाने में माहिर है, जबकि जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है।
“मजदूर की थाली में रोटी नहीं और रिपोर्ट में लिखा जाता है — ‘मजदूर संतुष्ट’। यह शर्मनाक है,”
एक नागरिक ने आक्रोशित स्वर में कहा।
कानूनी अधिकारों की अनदेखी
पेमेंट ऑफ बोनस एक्ट, 1965 के तहत प्रत्येक पात्र कर्मचारी को न्यूनतम 8.33% बोनस देना अनिवार्य है, लेकिन दीपका के मजदूरों को न बोनस मिला, न सम्मान।
हालांकि आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण रहा, लेकिन गुस्सा हवा में साफ महसूस किया जा सकता था।
मजदूरों ने कहा कि —
“इस बार दीपावली दीयों से नहीं, न्याय की लौ से जलेगी।”
दीपका की धरती पर मजदूरों की पुकार — “अब नहीं अन्याय!”
दीपका का यह आंदोलन अब केवल बोनस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह वर्षों से चली आ रही शोषण की व्यवस्था के खिलाफ सशक्त प्रतिरोध का प्रतीक बन गया है।
अब सवाल यह है — क्या SECL प्रबंधन इन नारों की गूंज सुन पाएगा, या दीपका की यह धरती एक और मजदूर संघर्ष की साक्षी बनेगी?





