August 15, 2026

त्रिनेत्र टाईम्स

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कार्तिक मास में खानपान और दिनचर्या का विशेष महत्व — नाड़ीवैद्य डॉ. नागेंद्र शर्मा ने दिए स्वास्थ्यवर्धक सुझाव मट्ठा न पिएं, जिमीकंद खाएं — ऋतुचर्या अपनाकर रहें स्वस्थ : डॉ. नागेंद्र नारायण शर्मा

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त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ****/ कोरबा/रायपुर, 8 अक्टूबर 2025।
हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास का शुभारंभ 8 अक्टूबर 2025, बुधवार से हो गया है, जो 5 नवंबर 2025, बुधवार तक रहेगा। आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार प्रत्येक मास में खानपान और दिनचर्या से जुड़ी विशेष अनुशंसाएँ दी गई हैं, जिनका पालन कर स्वास्थ्य को दीर्घकाल तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इसी विषय पर छत्तीसगढ़ प्रांत के ख्यातिलब्ध आयुर्वेद चिकित्सक एवं नाड़ीवैद्य डॉ. नागेंद्र नारायण शर्मा ने विस्तार से जानकारी साझा की।
डॉ. शर्मा ने बताया कि भारतीय परंपरा में ऋतुचर्या यानी ऋतुनुसार आहार-विहार का विशेष महत्व रहा है। यह संस्कृति हमें पीढ़ी दर पीढ़ी विरासत में मिली है। कार्तिक मास के दौरान मानसून के बाद का समय होता है, जब आसमान साफ़ और सूर्य की किरणें प्रखर हो जाती हैं। आयुर्वेद के अनुसार इस समय पित्त दोष का प्रकोप बढ़ता है, जिससे त्वचा रोग, पित्त जनित ज्वर (बुखार), पित्तज खांसी और अन्य पाचन संबंधी बीमारियों की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे में खानपान और जीवनशैली पर विशेष ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है।
🥗 आहार में करें ये बदलाव
डॉ. शर्मा ने बताया कि इस मास में आहार हल्का, पौष्टिक, पित्त शामक गुणों वाला होना चाहिए। इसमें स्निग्ध (घृत युक्त), मधुर एवं तिक्त रस वाले खाद्य पदार्थों को शामिल करना चाहिए, जो शरीर में संतुलन बनाए रखते हैं और लम्बे समय तक ऊर्जा प्रदान करते हैं।
उन्होंने कहा कि पित्त वर्धक पदार्थों तथा अत्यधिक कड़वे और कसैले स्वाद वाले खाद्य पदार्थों से परहेज करना चाहिए।
विशेष रूप से उन्होंने सलाह दी कि —
मट्ठा (छाछ) का सेवन कार्तिक मास में बिल्कुल न करें, क्योंकि यह पित्त को बढ़ाकर स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न कर सकता है।
दाल का सेवन इस अवधि में वर्जित माना गया है।
इसके विपरीत मूली और आंवला इस मौसम में अत्यंत हितकारी माने जाते हैं, जो पाचन क्रिया को सुधारते हैं और पित्त को शांत करने में मदद करते हैं।
कार्तिक मास में जिमीकंद (सुरन) का सेवन अवश्य करना चाहिए। पारंपरिक लोकोक्ति में कहा गया है —
“दीपावली में जिमीकंद न खाने वाला अगले जन्म में छुछूंदर होता है।”
यह कहावत कार्तिक मास में जिमीकंद के सेवन के महत्व को दर्शाती है।
इसके अतिरिक्त उन्होंने बताया कि इस महीने में च्यवनप्राश और हरीतकी को सममात्रा में शर्करा के साथ सेवन करना रसायन (टॉनिक) के रूप में लाभकारी होता है, जिससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है।
🌞 जीवनशैली में बरतें सावधानियाँ
डॉ. शर्मा ने कहा कि कार्तिक मास में केवल खानपान ही नहीं, बल्कि दैनिक दिनचर्या में भी विशेष सावधानी आवश्यक है। इस समय धूप, ओस और पूर्वी हवाओं से बचाव करें।
दिन में सोना, भूख न लगने पर भोजन करना और अत्यधिक व्यायाम करने से परहेज करें। इन आदतों से पित्त दोष और रोगों की संभावना बढ़ जाती है। नियमित समय पर हल्का एवं सुपाच्य भोजन, समय पर विश्राम और संतुलित दिनचर्या शरीर को स्वस्थ एवं ऊर्जावान बनाए रखने में सहायक होती है।
🪔 दीपावली और कार्तिक मास का स्वास्थ्य से गहरा संबंध
कार्तिक मास में दीपावली का पर्व भी मनाया जाता है। इस महीने में पारंपरिक खानपान और जीवनशैली केवल धार्मिक आस्था से जुड़ी नहीं है, बल्कि आयुर्वेद के अनुसार इसका सीधा संबंध स्वास्थ्य से है। ऋतुचर्या का पालन कर हम मौसमी बीमारियों से बचाव कर सकते हैं और शरीर में संतुलन बनाए रख सकते हैं।
डॉ. नागेंद्र नारायण शर्मा ने प्रदेशवासियों से अपील की कि वे इस कार्तिक मास में आयुर्वेदिक परंपराओं के अनुसार आहार–विहार अपनाएँ और ऋतु परिवर्तन के इस समय में स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखें। उन्होंने कहा कि “यदि हम भारतीय ऋतुचर्या के सिद्धांतों को अपनाएँ, तो बिना दवाओं के ही स्वस्थ रह सकते हैं और जीवन को दीर्घायु बना सकते हैं।”
📍 स्थान : कोरबा / रायपुर (छत्तीसगढ़)
✍️ प्रेषक — डॉ. नागेंद्र नारायण शर्मा, नाड़ीवैद्य एवं आयुर्वेदाचार्य

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