महापौर संजू देवी राजपूत और भाजपा जिला अध्यक्ष गोपाल मोदी की अगुवाई में कोरबा में परंपरा, आस्था और उल्लास का संगम — भोजली तिहार ने बिखेरी छत्तीसगढ़ी संस्कृति की छटा


सदियों पुरानी परंपरा, मित्रता और प्रकृति से जुड़ाव का अद्भुत संगम
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा।छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में सावन महीने की पावन परंपरा भोजली तिहार सोमवार को हर्षोल्लास और धार्मिक आस्था के साथ मनाया गया। सबसे पहले बालको स्थित श्री सर्वेश्वरी आश्रम में भोजली विसर्जन कार्यक्रम का आयोजन हुआ, जिसमें नगर निगम कोरबा की महापौर संजू देवी राजपूत और पार्षद नरेंद्र देवांगन शामिल हुए। दोनों जनप्रतिनिधियों ने भोजली माता की पूजा-अर्चना की और भव्य शोभायात्रा निकालकर तालाब में विसर्जन किया।









पथर्रीपारा में भव्य आयोजन, जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति
इसके बाद पथर्रीपारा में वार्डवासियों द्वारा आयोजित भोजली कार्यक्रम में महापौर संजू देवी राजपूत, भाजपा जिला अध्यक्ष गोपाल मोदी, मंडल अध्यक्ष राजेश राठौर, पार्षद नरेंद्र देवांगन, दिनेश वैष्णव और श्रीधर द्विवेदी ने माता पथर्री के मंदिर में दर्शन किए और जिलेवासियों के सुख, शांति और समृद्धि की कामना की। यहां की गलियों और चौपालों में पारंपरिक गीतों की गूंज, महिलाओं के उत्साह और रंग-बिरंगे वस्त्रों की छटा ने पूरे माहौल को धार्मिक और सांस्कृतिक रंग में रंग दिया।








बालको नगर में भोजली सजावट प्रतियोगिता ने बढ़ाया आकर्षण
इसी क्रम में बालको नगर के कनौजिया राठौर समाज द्वारा भोजली विसर्जन का आयोजन किया गया, जिसमें महापौर संजू देवी राजपूत और नेता प्रतिपक्ष हितानंद अग्रवाल ने मिलकर भोजली माता की पूजा-अर्चना की। इस अवसर पर आयोजित भोजली सजावट प्रतियोगिता में प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त करने वाली महिलाओं को सम्मानित किया गया। प्रतियोगिता में महिलाओं ने पारंपरिक सौंदर्य और रचनात्मकता का सुंदर संगम प्रस्तुत किया।
महापौर संजू देवी राजपूत का संबोधन
अपने संबोधन में महापौर संजू देवी राजपूत ने कहा —
“भोजली तिहार छत्तीसगढ़ की वैदिक परंपराओं की जीवंत धरोहर है। यह त्योहार गाँव से लेकर शहर तक, प्रकृति से हमारे जुड़ाव और सामूहिक भावना का प्रतीक है। नौ दिनों की पूजा के बाद महिलाओं के चेहरे पर जो आंतरिक खुशी झलकती है, वही इस पर्व की आत्मा है।”
भोजली तिहार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भोजली तिहार छत्तीसगढ़ का एक सदियों पुराना खेती और प्रकृति से जुड़ा लोकपर्व है। इसकी जड़ें कृषक संस्कृति में गहराई से जुड़ी हैं, जब वर्षा ऋतु में खेतों में हरी-भरी फसलें लहलहाती थीं। महिलाएं सावन में गेहूं, जौ या अन्य अनाज के अंकुरों को मिट्टी के पात्र में बोकर भोजली तैयार करती हैं।
नौ दिनों तक महिलाएं और बालिकाएं पारंपरिक गीत गाते हुए भोजली की पूजा करती हैं और दसवें दिन इसे जलाशयों में विसर्जित करती हैं। इस अवसर पर महिलाएं एक-दूसरे के कान में भोजली पहनाकर आजीवन मित्रता का संकल्प लेती हैं। यह पर्व मित्रता दिवस, प्रकृति पूजा और सामाजिक एकता का अनूठा संगम है, जिसमें धार्मिक आस्था और सामूहिकता की गहरी छाप दिखती है।
विसर्जन के बाद आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों, लोकगीतों और नृत्यों ने भोजली तिहार को और भी यादगार बना दिया। कोरबा जिले में यह पर्व न केवल आस्था का केंद्र बना, बल्कि सामाजिक मेलजोल और सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत करने का माध्यम भी सिद्ध हुआ।

