कोरबा में बढ़ता हाथी-मानव द्वंद, फसल बर्बादी से किसान परेशान, वन विभाग की कार्यशैली पर उठे सवाल



त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ***/ कोरबा। जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में हाथी-मानव द्वंद दिन-ब-दिन विकराल रूप लेता जा रहा है। पसरखेत और कुदमुरा रेंज में सक्रिय हाथियों ने खेतों में घुसकर किसानों की धान और मूंगफली की फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया है। इस वजह से ग्रामीणों में जहां भय और आक्रोश है, वहीं वन विभाग की लचर निगरानी व्यवस्था और देर से सक्रियता को लेकर असंतोष भी साफ नजर आ रहा है।
हाथी की करंट से मौत और नवजात शावक का निधन
किसानों ने अपनी फसलों की सुरक्षा के लिए खेतों में बिजली के तार बिछा दिए। दुर्भाग्यवश इनकी चपेट में आकर एक हाथी की मौत हो गई। यह मामला अभी शांत भी नहीं हुआ था कि एक दो दिन के नवजात शावक की भी मृत्यु हो गई। वन विभाग ने शावक की मौत का कारण निमोनिया बताया है और उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया है। लगातार हो रही हाथियों की मौतों ने वन्यजीव संरक्षण को लेकर गंभीर चिंता खड़ी कर दी है।
किसानों की बढ़ती चिंता, अनैतिक उपायों की ओर रुझान
फसलें बर्बाद होने के कारण किसानों में गहरी चिंता है। वे बार-बार प्रशासन से मदद की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन ठोस समाधान न मिलने के कारण कुछ किसान अनैतिक उपायों का सहारा लेने लगे हैं। खेतों में करंट बिछाना इसका उदाहरण है, जो न केवल हाथियों की जान के लिए खतरा है, बल्कि यह कानूनन अपराध भी है।
वन विभाग की कमजोर निगरानी प्रणाली पर उठे सवाल
वन विभाग द्वारा प्रत्येक बीट गार्ड को एक सीमित जंगल क्षेत्र (कंपार्टमेंट) की निगरानी की जिम्मेदारी दी जाती है। बावजूद इसके जंगल की निगरानी में लापरवाही सामने आ रही है। लेमरू हाथी रिज़र्व जैसे करोड़ों रुपये की परियोजनाएं शुरू की गईं, लेकिन फिर भी ना हाथियों की सुरक्षा हो पा रही है, ना ही किसानों की फसलें सुरक्षित रह पा रही हैं।
पसरखेत और कुदमुरा रेंज में हाथियों की सक्रियता
वर्तमान में पसरखेत रेंज में 11 हाथियों का दल, जबकि कुदमुरा रेंज में 25 हाथियों की उपस्थिति दर्ज की गई है। इनमें से पसरखेत के हाथियों ने मदनपुर के ग्राम छिरमहुआ में पिछले कुछ दिनों में काफी उपद्रव मचाया है। 5 ग्रामीणों की धान और मूंगफली की फसल को पूरी तरह बर्बाद कर दिया गया है।
ग्रामीणों का आरोप: नहीं मिलता वन विभाग से सहयोग
वन विभाग का कहना है कि हाथी फसलों से आकर्षित होकर गांव की ओर आ जाते हैं, लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि विभाग कोई कारगर उपाय नहीं करता। ना तो हाथियों को रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था की जाती है और ना ही खेतों की सुरक्षा हेतु कोई वैकल्पिक साधन उपलब्ध कराए जाते हैं।
वन्य जीव संरक्षण व्यवस्था पर सवाल
लगातार हो रही हाथियों की मौतों और फसलों की तबाही ने कोरबा वन मंडल की वन्यजीव सुरक्षा व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। जानकारों का कहना है कि शावक की मौत भले ही प्राकृतिक हो, लेकिन जिस प्रकार से करंट लगने से हाथी की जान गई और फिर शावक की मौत हुई, यह वन विभाग की सतर्कता और सक्रियता पर बड़ा प्रश्नचिह्न है।
निष्कर्ष:
कोरबा जिले में हाथी-मानव द्वंद अब सामान्य संघर्ष नहीं रहा, यह एक गंभीर प्रशासनिक एवं पर्यावरणीय चुनौती बन चुका है। जब तक वन विभाग हाथियों को जंगल में रोकने के लिए ठोस योजना नहीं बनाता और किसानों की फसल सुरक्षा हेतु भरोसेमंद उपाय नहीं करता, तब तक यह संघर्ष और भी विकराल होता जाएगा। किसानों की चिंता और हाथियों की जान – दोनों को एक साथ बचाने की आवश्यकता है।


