“आपातकाल: लोकतंत्र की हत्या और आत्मचिंतन का अध्याय – विनोद सिन्हा”




त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ****/ कोरबा। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 25 जून 1975 को लागू किया गया आपातकाल एक ऐसा काला अध्याय था, जिसे देश कभी नहीं भूल सकता। इसे याद करते हुए आपातकाल के साक्षी और लोकतंत्र रक्षक विनोद सिन्हा ने उस दौर की विभीषिका और आज की आवश्यकता – आर्थिक क्रांति – पर अपने विचार साझा किए।
विनोद सिन्हा ने बताया कि वर्ष 1973-74 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में शुरू हुआ छात्र आंदोलन एक व्यापक जन आंदोलन का रूप ले चुका था। इंदिरा गांधी सरकार की निरंकुश नीतियों और जनता की उपेक्षा ने हालात को और विकराल बना दिया। इसी बीच रायबरेली से उनका चुनाव निरस्त होने पर, उन्होंने सत्ता जाने के डर से 25 जून 1975 की रात तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से मिलकर आपातकाल की घोषणा कर दी।
इसके साथ ही लोकतंत्र की हत्या हो गई – प्रेस की स्वतंत्रता, नागरिक अधिकार, मानवाधिकार सब निलंबित कर दिए गए। देशभर में भय का वातावरण बन गया। विनोद सिन्हा बताते हैं कि 19 जुलाई 1975 को उन्हें भी गिरफ्तार कर भारत रक्षा कानून के तहत भागलपुर केंद्रीय जेल में 13 महीनों तक बंद रखा गया।
उन्होंने बताया कि कैसे उस समय संजय गांधी के नेतृत्व में जबरन नसबंदी कार्यक्रम चलाया गया और कैसे सरकारी कर्मचारियों पर लक्ष्य थोपे गए। सत्य बोलने वालों को दंडित किया गया और आम जनमानस भयाक्रांत होकर जीने पर मजबूर था।
उन्होंने पश्चिम बंगाल की वर्तमान राजनीतिक स्थिति की तुलना आपातकाल के दौर से की, जहां आज भी आम लोग भय के वातावरण में जी रहे हैं और लोकतंत्र खतरे में नजर आता है।
अपने संदेश में उन्होंने विशेष रूप से युवाओं और महिलाओं को आर्थिक क्रांति की दिशा में आगे बढ़ने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि भारत को एक बार फिर सोने की चिड़िया और विश्वगुरु बनाना है तो देश के प्रत्येक नागरिक को नौकरी के पीछे भागने के बजाय स्व-रोजगार और व्यापार में कदम रखना चाहिए। इससे करोड़ों भारतीय आत्मनिर्भर बनकर देश को आर्थिक रूप से सशक्त बना सकते हैं।
उन्होंने इस अवसर पर यह भी कहा कि – “आपातकाल की विभीषिका हमें यह सिखाती है कि लोकतंत्र की रक्षा केवल भाषणों से नहीं, अपितु जागरूकता, आत्मबलिदान और राष्ट्रहित में लिए गए कठिन निर्णयों से होती है। आज जरूरत है कि हम आर्थिक दृष्टि से सशक्त हो ताकि कोई भी शासन फिर कभी नागरिक अधिकारों को कुचल न सके।”


