⚡ “उर्जाधानी में अंधेरा: 13,000 मेगावाट के जिले में 9 घंटे ब्लैकआउट, जिम्मेदार कौन?”



त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ***//**// कोरबा। छत्तीसगढ़ की उर्जाधानी कही जाने वाली कोरबा एक बार फिर अपनी ही बिजली व्यवस्था की विफलता का शिकार बन गई। विडंबना देखिए—जहां से देशभर को ऊर्जा और कोयला मिलता है, वहीं के निवासी शाम 6:07 बजे से रात 3:00 बजे तक अंधेरे में रहने को मजबूर रहे।
यह कोई पहली घटना नहीं, बल्कि हर बारिश और हल्की आंधी के साथ दोहराया जाने वाला “स्थायी संकट” बन चुका है।
⚡ कोयला निकलता है, लेकिन उजाला नहीं पहुंचता
कोरबा बिजली उत्पादन का बड़ा केंद्र जरूर है, लेकिन हकीकत यह है कि यहां बिजली पैदा नहीं होती, बल्कि कोयले का दोहन होता है, और बिजली कहीं और बनकर जाती है।
इसके बावजूद स्थानीय जनता को नियमित, निर्बाध बिजली तक नसीब नहीं हो पा रही।
🌩️ एक आंधी और पूरी व्यवस्था ठप
जैसे ही मौसम बदला, बिजली व्यवस्था ने घुटने टेक दिए। अधिकारियों की ओर से वही पुराना जवाब—
👉 “तार पर पेड़ गिर गया”
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि
✔️ पेड़ों की कटिंग/ट्रिमिंग पहले क्यों नहीं हुई?
✔️ क्या मेंटेनेंस सिर्फ कागजों में ही होता है?
✔️ हर साल वही समस्या, फिर भी कोई स्थायी समाधान क्यों नहीं?
📞 फोन ‘एयरप्लेन मोड’ में, जनता अंधेरे में
जब परेशान जनता ने जानकारी के लिए बिजली विभाग को फोन लगाया, तो हालात और चौंकाने वाले निकले—
👉 कई नंबर स्विच ऑफ
👉 कुछ रिसीव ही नहीं
👉 और कुछ तो मानो एयरप्लेन मोड में डाल दिए गए हों
ऐसे में जनता सवाल पूछ रही है—
“जब बिजली जाती है, तो संपर्क किससे करें?”
👷 मैदान में कर्मचारी, लेकिन सिस्टम फेल
नवपदस्थ AE जोशी के अधीन कर्मचारी रातभर फॉल्ट ढूंढते रहे, इसमें कोई दो राय नहीं कि जमीनी स्तर पर मेहनत हुई।
लेकिन असली सवाल सिस्टम पर है—
👉 अगर हर बार फॉल्ट ढूंढना ही पड़े, तो स्थायी समाधान कब होगा?
🏠 जनता हाथ पंखा लेकर, व्यवस्था गहरी नींद में
एक तरफ आम लोग रातभर हाथ पंखा झलते रहे,
तो दूसरी तरफ जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि खामोश नजर आए।
👉 जिले के बड़े अधिकारी कहां थे?
👉 जिम्मेदार इंजीनियर या विभाग प्रमुख सामने क्यों नहीं आए?
👉 कौन है वह अधिकारी जो इस बदहाल व्यवस्था के लिए जवाबदेह है?
🏛️ जनप्रतिनिधि और विपक्ष—दोनों मौन
सबसे गंभीर पहलू यह है कि
✔️ सत्तापक्ष के जनप्रतिनिधि इस मुद्दे पर चुप
✔️ विपक्ष भी कोई ठोस आवाज नहीं उठा रहा
ऐसे में जनता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है।
⚠️ बड़ा सवाल: जवाबदेही तय कब होगी?
हर महीने समय पर बिल वसूली,
लेकिन सुविधा के नाम पर अंधेरा—
👉 क्या सिर्फ उपभोक्ता ही जिम्मेदार है?
👉 क्या विभाग और अधिकारियों की कोई जवाबदेही नहीं?
🔥 निष्कर्ष: “उत्पादन चरम पर, व्यवस्था धराशायी”
कोरबा की बिजली व्यवस्था आज यह संदेश दे रही है—
“यहां कोयला निकलता है, बिल आता है, लेकिन उजाला व्यवस्था की मर्जी से ही आता है।”
जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होगी,
तब तक “उर्जाधानी” का यह अंधेरा खत्म होना मुश्किल है।


