“बस्तर का दर्द न समझने वालों से कोई वार्ता नहीं, माओवादियों से बिना शर्त बातचीत को तैयार”: उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा




त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ****/ रायपुर/बस्तर। छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने माओवादी समस्या पर राज्य सरकार की मंशा स्पष्ट करते हुए बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि यदि माओवादी संगठन बिना शर्त बातचीत के लिए तैयार हैं, तो राज्य सरकार चर्चा के लिए तैयार है। लेकिन इस बातचीत की बागडोर उन लोगों के हाथ में नहीं हो सकती जो न तो छत्तीसगढ़ के दर्द को समझते हैं और न ही बस्तर के जमीनी हालात से कभी जुड़े रहे हैं।
उपमुख्यमंत्री शर्मा ने माओवादियों द्वारा जारी एक कथित पत्र के संदर्भ में कहा कि पहले तो उस पत्र की प्रामाणिकता की जांच की जाएगी। उसके बाद ही कोई आगे की प्रक्रिया तय की जाएगी। उन्होंने साफ कहा कि “हम बातचीत से नहीं भागते, लेकिन मध्यस्थता का दावा करने वाले कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी और संस्थान—जिन्होंने कभी बस्तर की पीड़ा को न समझा, न महसूस किया—वे इस प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बन सकते।”
“बस्तर के ज़ख्मों को न जानने वालों को बातचीत का अधिकार नहीं”
विजय शर्मा ने बस्तर में नक्सल हिंसा के ऐतिहासिक प्रसंगों को याद करते हुए कहा कि चिंगावरम, दरभागुड़ा, एर्राबोर, मनीकोंटा, रानीबोदली, ताड़मेटला जैसी घटनाएं बस्तर की आत्मा को छलनी कर चुकी हैं। उन्होंने कहा कि जब झीरम घाटी की विभीषिका में छत्तीसगढ़ का नेतृत्व खत्म कर दिया गया, तब भी कई तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ता और संस्थाएं खामोश रहीं।
“जो लोग बस्तर की माटी पर कभी चले नहीं, जिनकी आंखों ने कभी आदिवासी जनजीवन का दुख नहीं देखा, वे अब वार्ता के ठेकेदार बनना चाहते हैं। यह स्वीकार्य नहीं है,” शर्मा ने दो टूक शब्दों में कहा।
“सरकार बातचीत को तैयार, लेकिन अपनी शर्तों पर नहीं, संवेदना की जमीन पर”
उपमुख्यमंत्री ने जोर देकर कहा कि राज्य सरकार माओवाद के समाधान के लिए हर संवैधानिक रास्ता अपनाने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन यह वार्ता उन लोगों के माध्यम से नहीं हो सकती जो दिल्ली, हैदराबाद या अन्य शहरी केंद्रों से बैठकर छत्तीसगढ़ की नीति तय करना चाहते हैं।
“बातचीत केवल उन्हीं से होगी जो हिंसा का रास्ता छोड़ने को तैयार हैं और जिनका उद्देश्य वास्तव में आदिवासियों की भलाई है, न कि वैचारिक ढकोसलों के जरिए अराजकता फैलाना,” शर्मा ने कहा।
विजय शर्मा के इस बयान से स्पष्ट है कि छत्तीसगढ़ सरकार माओवाद से जूझ रही समस्या को लेकर सजग और गंभीर है। लेकिन अब संवाद उन्हीं से होगा जिन्होंने छत्तीसगढ़ के घावों को देखा, समझा और सम्मान दिया है। बस्तर की पीड़ा पर संवेदनशीलता के बिना कोई भी वार्ता टिकाऊ नहीं हो सकती—यही इस सरकार का स्पष्ट संदेश है।


