आयुर्वेद का चमत्कार* *असाध्य रोग हुआ साध्य*



*“चिकित्सात् पुण्यतम न किञिचत”*
*”धन्यवाद उस परमपिता को जिसने हमें यह काम दिया,*
*जनसेवा का महालक्ष्य दे हमें चिकित्सक नाम दिया।”*
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा *चिकित्सा कर्म करना सिर्फ अर्थोपार्जन तक ही सीमित नहीं है। उससे कहीं अधिक संतुष्टि और प्रसन्नता तब होती है जब मरीज़ या मरीज़ के परिजन आकर बताते हैं, की आपके इलाज से लाभ हुआ। तब लगता है की ईश्वर ने हमको चिकित्सक बनाकर हम पर बहुत बड़ा उपकार कीया है। जिसके लिये हम उन्हें जितना धन्यवाद दें कम ही होगा।*
*ऐसा ही कुछ कल मेरे साथ हुआ जब बाल्को निवासी श्री ओम प्रकाश राठौर जी अपने किसी परिचित की स्वास्थ्य संबंधी समस्या को लेकर मेरे पास आये, तब उन्होंने बताया की आज से 10 वर्ष पूर्व वो अपनी चिकित्सा के लिये आये थे उन्होंने बताया की उन्हें श्वास रोग से संबंधित गंभीर समस्या हो गई थी। जिसे टीबी रोग कहा जाता है।*
*जिसके कारण उनके फेफड़े में पानी भर गया था और बहुत ज्यादा खांसी एवं कमजोरी की समस्या रहती थी। जिसका उन्होंने बहुत जगह उपचार कराया था और सभी तरह के दवा का कोर्स भी पूरा करने पर लाभ नहीं मिल पा रहा था। जो आपकी चिकित्सा से मात्र 4 महीने में ही पूरी तरह ठीक हो गया। तब 2014 से आज 2024 तक उससे संबंधित कोई समस्या मुझे नहीं हुई और मैं सभी काम करने में भी पूरी तरह सक्षम हूं, और स्वस्थ हूँ। और मेरा वह रोग आपकी चार माह की दवा से जड़ से ठीक हो गया*
*यह चमत्कार मेरा नहीं आयुर्वेद का है। आयुर्वेद जो संपूर्ण जगत के प्राणीयों के लिये हैं, जो ऋषियों एवं आचार्यो की देन है, जो शाश्वत है, नित्य है, विशुध्द और निरापद है। हम उस विधा के अनुयायी हैं, शिष्य हैं, चिकित्सक हैं। और इस पर हमें घमंड नहीं अपितु गर्व है की हम उस ऋषि परंपरा के संवाहक हैं।*

