January 21, 2026

त्रिनेत्र टाईम्स

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कोरबा। रेलवे द्वारा मालगाड़ी में निर्धारित क्षमता से ज्यादा कोयला लोड कर परिचालन किया जा रहा है। इससे जहां रेल पटरी क्षतिग्रस्त हो रही हैं, वहीं दुर्घटनाएं भी बढ़ने लगी है। कोयला लोड बैगन के पटरी से नीचे उतरने पर आवागमन भी प्रभावित हो रहा है, पर रेल प्रबंधन का ध्यान केवल कोयला लदान बढ़ाना है।
औद्योगिक जिला में स्थित एसईसीएल की गेवरा, दीपका व कुसमुंडा मेगा परियोजना संचालित है। इन वर्तमान में तीनों परियोजना से प्रतिदिन एक-एक लाख टन से भी ज्यादा कोयला निकल रहा है। इसके अलावा मानिकपुर, सुराकछार, बलगी, बगदेवा, ढेलवाडीह व सिंघाली खदान में उत्खनन कार्य किया जा रहा है। इन खदानों से निकले कोयला को परिवहन सर्वाधिक मालगाडी के माध्यम से किया जाता है। इसके बाद रोड सेल से होता है। खदानो से प्रतिदिन 35 रैक कोयला छत्तीसगढ़ समेत महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, पंजाब व अन्य राज्य में स्थित विद्युत संयंत्र व अन्य उपक्रमों में आपूर्ति किया जा रहा है। एक रैक में 60 वैगन होते हैं। प्रत्येक वैगन में 58 से 61 टन कोयला भरने की क्षमता होती है, पर रेल प्रबंधन द्वारा निर्धारित क्षमता से ज्यादा कोयला लोड किया जा रहा है। इससे रेल पांत क्षतिग्रस्त हो रही है और दुर्घटनाएं बढ़ रही है। दीपका साईडिंग में भी मालगाड़ी के पांच वैगन बेपटरी हो गए है, क्योकि क्षमता से ज्यादा कोयला भरे जाने पर नीचे पटरी पर गिरने लगता है और यही कोयला चूरा होकर पानी में गीला होने से जम जाता है। इससे मालगाड़ी के पहिए पटरी पर ठीक से नहीं चल पाते हैं। इससे पटरी से नीचे उतर जाते हैं। साथ ही दूसरी लाईन में भी आवागमन प्रभावित होता है। ऐसा नही है कि रेल प्रबंधन को इसकी जानकारी न हो, जानकारी होने के बावजूद कोई ध्यान नहीं दिया जाता है। दरअसल रेल प्रबंधन द्वारा निजी कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए वैगन में अधिक कोयला लोड किया जा रहा है। इसमें निजी कंपनियों में अडानी पावर, एम बी पावर, महाराष्ट्र राज्य विद्युत निगम, नाभ शक्ति, सूरत गढ़ बिजली, अडानी बिजली, रतन भारत शक्ति, वरोरा ऊर्जा, धारीवाल इंफ्रास्ट्रक्चर तथा तलवंडी सत्ता का नाम प्रमुखता से शामिल है। इन्हीं कंपनियों की वजह से रेलवे अधिकारी अधिक कोयला लोड करने से परहेज नहीं कर रहे हैं।

शासन को पहुंच रही राजस्व क्षति
मालगाड़ी के बेपटरी होने से राज्य शासन को भी राजस्व क्षति उठानी पड़ रही है, क्योंकि जितने वैगन पटरी से उतरे रहते हैं,उनका कोयला बिखर कर नीचे गिर जाता है। रेलवे द्वारा पुन: उक्त कोयला को नहीं उठाया जाता है, इससे राज्य शासन को मिलने वाला राजस्व का नुकसान होता है। इसके अलावा वैगन की जितनी क्षमता होती है, उतने कोयला का ही राजस्व, शासन को प्रदान किया जाता है, पर इससे अधिक कोयला लोड करने पर राजस्व नहीं दिया जाता, क्योंकि इसकी जानकारी शासन को नहीं दी जाती है।

बंद रहता है रेलवे फाटक
रेलवे लाइन की वजह से शहर दो हिस्सों में बंटा हुआ है और आवागमन करने के लिए मार्ग में फाटक लगे हुए है। मालगाड़ी का परिचालन प्रत्येक 15 मिनट में होता है, इससे फाटक बंद कर दिया जाता है और जब तक दोनों तरफ से मालगाड़ी पार न हो जाए, तब तक खोला नहीं जाता है। खोलने के महज 10 मिनट के अंतराल में पुन: फाटक बंद कर दिया जाता है। इससे मार्ग में चलने वालों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। काफी देर तक फाटक में खड़ा होकर मालगाड़ी गुजरने का इंतजार करना होता है।

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