बारिश की अमूल्य सौगात ‘पुटू’ : छत्तीसगढ़ के जंगलों का सफेद सोना, स्वाद ऐसा कि ₹400 से ₹1000 किलो तक बिकता है, सेहत के लिए भी बेहद लाभकारी
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त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**//** रायपुर/कोरबा। मानसून की पहली अच्छी बारिश के साथ ही छत्तीसगढ़ के जंगलों में प्रकृति का एक अनमोल उपहार दिखाई देता है, जिसे अलग-अलग क्षेत्रों में पुटू, खुखड़ी, बोड़ा, साल बोड़ा (सरई बोड़ा), रुगड़ा, फुटू, बांस पुटू, हल्दी पुटू, पान पुटू और जाम पुटू के नाम से जाना जाता है। यह प्राकृतिक रूप से उगने वाला जंगली मशरूम है, जिसकी खेती सामान्य रूप से नहीं की जाती। यही वजह है कि बरसात के सीमित दिनों में इसकी बाजार में जबरदस्त मांग रहती है और कीमत कई बार ₹400 से ₹1000 प्रति किलो तक पहुंच जाती है।
यह दुर्लभ जंगली मशरूम मुख्य रूप से सरगुजा, जशपुर, बलरामपुर, कोरिया, सूरजपुर, कोरबा, बस्तर, कांकेर, कोंडागांव, नारायणपुर, बीजापुर, दंतेवाड़ा, गरियाबंद, धमतरी तथा अन्य साल (सरई) वन क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है। यह विशेष रूप से साल के पेड़ों के नीचे, दीमक की बांबियों के आसपास तथा नमी वाली वन भूमि में पहली अच्छी बारिश के बाद जून के अंतिम सप्ताह से अगस्त तक उगता है।
ग्रामीण और आदिवासी सुबह-सुबह जंगलों में जाकर गिरी हुई पत्तियों और मिट्टी को सावधानी से हटाकर पुटू निकालते हैं। इसके लिए वर्षों का अनुभव आवश्यक होता है, क्योंकि जंगलों में कुछ जहरीले मशरूम भी पाए जाते हैं, जो देखने में खाने योग्य पुटू जैसे लग सकते हैं। यही कारण है कि इसकी पहचान में विशेष सावधानी बरती जाती है।
पुटू अपने बेहतरीन स्वाद के साथ-साथ पोषण का भी उत्कृष्ट स्रोत माना जाता है। इसमें प्रोटीन, फाइबर, विटामिन, खनिज लवण और एंटीऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इसका सेवन शरीर को ऊर्जा देने, मांसपेशियों के विकास में सहायक होने, पाचन को बेहतर बनाने तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता को सहयोग देने वाले पोषक तत्व उपलब्ध कराने के लिए जाना जाता है। कम वसा होने के कारण इसे पौष्टिक मौसमी खाद्य पदार्थ भी माना जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार जंगलों में मिलने वाले सभी मशरूम खाने योग्य नहीं होते। गलत पहचान वाला मशरूम जहरीला हो सकता है, इसलिए केवल पहचान वाले, सुरक्षित और विश्वसनीय स्रोत से प्राप्त पुटू का ही सेवन करना चाहिए।
पुटू की ऊंची कीमत के पीछे कई कारण हैं। इसकी खेती सामान्य रूप से संभव नहीं है, यह केवल कुछ सप्ताह के लिए प्राकृतिक रूप से उपलब्ध होता है, जंगलों से खोजकर लाना पड़ता है और इसकी मांग हमेशा आपूर्ति से अधिक रहती है। यही वजह है कि हर वर्ष बरसात शुरू होते ही स्थानीय हाट-बाजारों में इसे खरीदने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती है।
बरसात का यह अनमोल वन उत्पाद केवल स्वादिष्ट व्यंजन ही नहीं, बल्कि हजारों आदिवासी और ग्रामीण परिवारों की मौसमी आय का भी महत्वपूर्ण साधन है। छत्तीसगढ़ की पारंपरिक संस्कृति, जैव विविधता और प्राकृतिक संपदा का प्रतीक बन चुका पुटू आज भी लोगों की पहली पसंद बना हुआ है और हर वर्ष इसके आने का बेसब्री से इंतजार किया जाता है।


