पुरुषोत्तम मास में आम, लीची, जामुन और मखाना का बढ़ता महत्व: सात्विक भोजन, भक्ति और प्रकृति का अद्भुत संगम



गर्मी के मौसम में भगवान विष्णु की आराधना के साथ मौसमी फलों और सात्विक व्यंजनों की बढ़ती महत्ता, संयमित जीवनशैली का देते हैं संदेश
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**// धर्म-संस्कृति विशेष। पुरुषोत्तम मास, जिसे अधिक मास भी कहा जाता है, भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित एक अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी मास माना जाता है। इस माह में श्रद्धालु भक्ति, जप, तप, दान और सात्विक जीवनशैली अपनाकर भगवान विष्णु की आराधना करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस अवधि में किए गए शुभ कार्यों का फल कई गुना अधिक प्राप्त होता है। बिहार सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों में इस मास के दौरान सात्विक भोजन और मौसमी फलों का विशेष महत्व रहता है।
फलों के राजा आम का विशेष स्थान
गर्मी के मौसम में आम की मिठास और सुगंध लोगों को आकर्षित करती है। आम को फलों का राजा कहा जाता है और इसे समृद्धि, मधुरता तथा शुभता का प्रतीक माना जाता है। पुरुषोत्तम मास में श्रद्धालु भगवान विष्णु को आम अर्पित कर प्रसाद स्वरूप ग्रहण करते हैं। बिहार के बागानों में इस समय लंगड़ा, मालदा, जर्दालू, दशहरी और चौसा जैसी प्रसिद्ध किस्मों की भरपूर आवक रहती है।
कटहल और मखाना भी बनते हैं श्रद्धा और स्वाद का केंद्र
बिहार में कटहल को शाकाहारी भोजन का राजा माना जाता है। पुरुषोत्तम मास के दौरान बिना प्याज और लहसुन के बनी कटहल की सात्विक सब्जी घरों में विशेष रूप से तैयार की जाती है। वहीं बिहार की पहचान मखाना भी इस माह में विशेष महत्व रखता है। मखाना की खीर, भुना मखाना और मखाना युक्त प्रसाद भगवान विष्णु को अर्पित किया जाता है।

इन फलों की रहती है विशेष मांग
पुरुषोत्तम मास और गर्मी के मौसम में आम, केला, लीची, जामुन, तरबूज, खरबूजा, पपीता, बेल, खीरा, ककड़ी, नारियल और अन्य मौसमी फलों का विशेष महत्व रहता है। श्रद्धालु इन फलों को पूजा में अर्पित करने के साथ-साथ फलाहार के रूप में भी ग्रहण करते हैं।
लीची और जामुन बनाते हैं मौसम को खास
बिहार की प्रसिद्ध लीची अपनी मिठास और स्वाद के लिए देशभर में जानी जाती है। इसी प्रकार जामुन भी गर्मी के मौसम का महत्वपूर्ण फल माना जाता है। उपवास और फलाहार करने वाले श्रद्धालु इन फलों को विशेष रूप से अपने आहार में शामिल करते हैं।
ऐसा होता है पुरुषोत्तम मास का सात्विक भोजन
इस पवित्र माह में श्रद्धालु सादा चावल, मूंग दाल, अरहर दाल, कद्दू की सब्जी, लौकी-चना दाल, परवल की सब्जी, कटहल की सात्विक सब्जी, दही-चूड़ा, सत्तू का शर्बत, मखाना खीर, खीर-पूड़ी, फलाहार और पंचामृत जैसे शुद्ध एवं सात्विक व्यंजनों का सेवन करते हैं। भोजन में प्याज, लहसुन, मांसाहार और तामसिक पदार्थों का पूर्णतः त्याग किया जाता है।
गर्मी से राहत देने वाले पारंपरिक पेय
इस मौसम में सत्तू का शर्बत, बेल का शरबत, छाछ, मट्ठा और नींबू पानी भी लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बन जाते हैं। ये पेय शरीर को शीतलता प्रदान करने के साथ-साथ ऊर्जा और स्वास्थ्य भी बनाए रखते हैं।
भगवान को भोग लगाकर ग्रहण किया जाता है भोजन
पुरुषोत्तम मास में तैयार किए गए भोजन और फलों को पहले भगवान विष्णु को अर्पित किया जाता है। इसके पश्चात प्रसाद स्वरूप भोजन ग्रहण किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि ऐसा करने से भोजन पवित्र और पुण्यदायी बन जाता है।
भक्ति, स्वास्थ्य और संस्कृति का अनूठा संगम
धर्माचार्यों के अनुसार पुरुषोत्तम मास केवल पूजा-पाठ का अवसर नहीं, बल्कि संयम, सात्विकता और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने का भी संदेश देता है। आम, लीची, जामुन, तरबूज, खरबूजा, कटहल और मखाना जैसे प्राकृतिक उपहारों के साथ सात्विक भोजन की परंपरा इस माह को और अधिक विशेष बना देती है। यही कारण है कि पुरुषोत्तम मास श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक उन्नति, स्वास्थ्य संरक्षण और भारतीय संस्कृति के संरक्षण का अनुपम पर्व माना जाता है।


