March 10, 2026

त्रिनेत्र टाईम्स

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बालको की ‘उन्नति’ परियोजना से बदली गंगोत्री की तकदीर, मजदूरी से आत्मनिर्भर बनकर बनीं ‘मशरूम दीदी’

 

त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ****//** कोरबा। वेदांता समूह की कंपनी भारत एल्यूमिनियम कंपनी लिमिटेड (बालको) की सामुदायिक विकास पहल ‘उन्नति’ परियोजना ग्रामीण महिलाओं के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला रही है। इस परियोजना के माध्यम से स्व-सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को प्रशिक्षण और सहयोग देकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है। इसी पहल से प्रेरित होकर लालघाट क्षेत्र की निवासी गंगोत्री विश्वकर्मा ने मजदूरी के कठिन जीवन से निकलकर मशरूम उत्पादन के माध्यम से अपनी अलग पहचान बनाई है। आज लोग उन्हें स्नेह से ‘मशरूम दीदी’ के नाम से जानते हैं।
गंगोत्री विश्वकर्मा बताती हैं कि कुछ वर्ष पहले तक उनका जीवन पूरी तरह रोज़ की मजदूरी पर निर्भर था। कई बार काम नहीं मिलने पर घर का चूल्हा जलाना भी मुश्किल हो जाता था। बच्चों की जिम्मेदारी और भविष्य की चिंता उन्हें लगातार परेशान करती थी। लेकिन वर्ष 2019 में बालको की उन्नति परियोजना के अंतर्गत जय मां हर्षिता स्व-सहायता समूह से जुड़ने और मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण लेने के बाद उनकी जिंदगी ने नई दिशा पकड़ ली।
प्रशिक्षण के बाद उन्होंने मशरूम की खेती शुरू की। शुरुआत में उन्होंने 16 बैग लगाए, लेकिन पहली फसल में केवल 2 बैग में ही मशरूम उग पाए। शुरुआती असफलता के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपनी गलतियों को सुधारते हुए फिर से प्रयास किया। धीरे-धीरे उनका उत्पादन बढ़ता गया और आज उनकी मशरूम इकाई में लगभग 200 बैग तक उत्पादन होने लगा है।
मशरूम की खेती में 20 से 25 दिनों के भीतर उत्पादन शुरू हो जाता है और सप्ताह के अंतराल पर तीन बार फसल मिलती है। लगातार उत्पादन बनाए रखने के लिए गंगोत्री रोज़ाना दो नए बैग तैयार करती हैं। वैज्ञानिक पद्धति से तैयार किए गए बैगों में अच्छी पैदावार होती है, जिससे उन्हें नियमित आय प्राप्त हो रही है।
गंगोत्री अपनी पूरी उपज स्वयं बाजार में बेचती हैं। शुरुआती दौर में बालको की सीएसआर टीम ने उन्हें प्रशिक्षण के साथ-साथ आवश्यक मार्गदर्शन भी दिया, जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा। आज वे न केवल मशरूम का उत्पादन कर रही हैं, बल्कि अपने समूह की अन्य महिलाओं को भी बीज उपलब्ध कराकर उन्हें इस कार्य से जोड़ रही हैं। वर्तमान में वे जय मां हर्षिता स्व-सहायता समूह की सचिव के रूप में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
कोविड काल में जब उनके पति की आमदनी लगभग बंद हो गई थी, तब मशरूम की खेती उनके परिवार के लिए सहारा बनी। इसी आय से उन्होंने घर का खर्च चलाने के साथ बचत भी की और बाद में एक ऑटो रिक्शा खरीदा। आज उनके पति उसी ऑटो को चलाते हैं और समय मिलने पर मशरूम उत्पादन में भी सहयोग करते हैं।
वर्तमान में मशरूम उत्पादन से गंगोत्री को प्रति माह लगभग 15 हजार रुपये का लाभ हो रहा है। इस आय से अब वे अपने बच्चों की पढ़ाई और परिवार की जरूरतों को लेकर निश्चिंत हैं। उनका सपना है कि आने वाले समय में वे मशरूम उत्पादन को 200 बैग से बढ़ाकर 5 हजार बैग तक पहुंचाएं, ताकि उनके साथ अन्य महिलाएं भी आत्मनिर्भर बन सकें।
गंगोत्री विश्वकर्मा की यह कहानी इस बात का उदाहरण है कि सही प्रशिक्षण, संस्थागत सहयोग और मजबूत संकल्प के साथ कोई भी महिला अपने जीवन की दिशा बदल सकती है। बालको की उन्नति परियोजना आज ऐसी ही कई महिलाओं के जीवन में उम्मीद और आत्मनिर्भरता की नई रोशनी जगा रही है।

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