देवउठनी एकादशी पर गूंजे भक्ति और विश्वास के स्वर — प्रभु श्री विष्णु के जागरण दिवस पर श्रद्धा और आस्था का हुआ संगम


।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।।
पंडित डॉ. नागेंद्र नारायण शर्मा ने बताया देवउठनी एकादशी व्रत का महत्व और पौराणिक कथा
कोरबा।
कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवउठनी एकादशी कहा जाता है, जिसे देवोत्थान एकादशी, प्रबोधिनी एकादशी या देवउठनी ग्यारस के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान श्री हरि विष्णु चार महीने की योगनिद्रा के बाद क्षीरसागर से जाग्रत होकर सृष्टि संचालन का कार्य पुनः आरंभ करते हैं। यह तिथि आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र मानी जाती है और भगवान विष्णु के भक्त इस दिन व्रत, पूजा और कथा श्रवण कर पुण्य अर्जित करते हैं।
तिथि और शुभ मुहूर्त
पंडित डॉ. नागेंद्र नारायण शर्मा (नाड़ीवैद्य) ने जानकारी देते हुए बताया कि
कार्तिक शुक्ल एकादशी तिथि का प्रारंभ — 1 नवंबर 2025, शनिवार प्रातः 09 बजकर 12 मिनट से
समापन — 2 नवंबर 2025, रविवार प्रातः 07 बजकर 32 मिनट तक रहेगा।
व्रत तिथि — 2 नवंबर 2025, रविवार
व्रत पारण (उपवास खोलने का समय) — 3 नवंबर 2025, सोमवार प्रातः 06:34 से 08:46 बजे तक शुभ रहेगा।
इस दिन विशेष रूप से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा-अर्चना, तुलसी विवाह तथा दीपदान का विशेष महत्व होता है।
देवउठनी एकादशी व्रत कथा – 1
पंडित शर्मा ने बताया कि एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक राजा के राज्य में एकादशी व्रत का अत्यंत पालन किया जाता था। उस दिन कोई भी व्यक्ति अन्न ग्रहण नहीं करता था — यहां तक कि पशुओं तक को अन्न नहीं दिया जाता था। एक बार एक बाहरी व्यक्ति राजा के दरबार में नौकरी के लिए आया। राजा ने शर्त रखी कि एकादशी के दिन अन्न नहीं मिलेगा।
वह व्यक्ति तैयार हो गया, पर जब एकादशी आई तो वह भूख से व्याकुल होकर अन्न मांगने लगा। राजा ने उसे मना किया, किंतु वह नहीं माना और अन्न लेकर नदी किनारे जाकर पकाने लगा। उसने भगवान को भोजन ग्रहण करने के लिए पुकारा — और चमत्कार हुआ, भगवान स्वयं चतुर्भुज रूप में प्रकट होकर उसके साथ भोजन करने लगे।
जब राजा को यह बात पता चली, तो उसे विश्वास नहीं हुआ। वह अगले एकादशी पर छिपकर देखने गया। उस व्यक्ति ने जब भगवान को बुलाया तो वे देर तक नहीं आए। तब उसने कहा — “हे प्रभु! यदि आप नहीं आए तो मैं प्राण त्याग दूंगा।” यह सुन भगवान तुरंत प्रकट हुए और भक्त को अपने धाम ले गए। राजा ने यह दृश्य देखा और समझा कि व्रत का फल तभी मिलता है जब मन निर्मल और भक्तिभाव से पूर्ण हो। तत्पश्चात राजा ने सच्चे मन से व्रत-पूजन प्रारंभ किया और मोक्ष को प्राप्त हुआ।
देवउठनी एकादशी व्रत कथा – 2
दूसरी कथा के अनुसार, एक राजा के राज्य में एकादशी के दिन कोई अन्न नहीं बिकता था। सभी फलाहार करते थे। भगवान ने राजा की परीक्षा लेने हेतु एक सुंदर स्त्री का रूप धारण किया और नगर मार्ग पर बैठ गए। राजा उस रूप को देखकर आकर्षित हुआ और उसे अपने महल में ले आया।
सुंदरी ने कहा — “मैं तुम्हारी रानी बनूंगी, किंतु तुम्हें राज्य का अधिकार मुझे देना होगा और जो मैं पकाऊं, वही तुम्हें खाना होगा।” राजा ने यह शर्त मान ली। अगले दिन एकादशी थी, और रानी ने मांस-मछली का भोजन तैयार करवाया। राजा ने कहा कि आज एकादशी है, वह फलाहार ही करेगा। रानी ने कहा — “यदि तुमने अन्न न खाया, तो मैं तुम्हारे पुत्र का सिर काट दूंगी।”
राजा ने धर्म को सर्वोपरि मानते हुए कहा कि पुत्र तो पुनः मिल सकता है, पर धर्म नहीं। जैसे ही राजा ने धर्म की रक्षा हेतु अपने पुत्र को बलिदान देने का निर्णय लिया, वैसे ही भगवान विष्णु अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हुए और बोले — “राजन! यह तुम्हारी परीक्षा थी। तुम धर्म पर अडिग रहे।” भगवान ने प्रसन्न होकर राजा को मोक्ष का वरदान दिया और वह अपने पुत्र सहित विमान में बैठकर विष्णु लोक को चला गया।
व्रत का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
देवउठनी एकादशी के दिन से ही विवाह, मांगलिक कार्य और शुभ संस्कार प्रारंभ करने की परंपरा मानी जाती है। इस दिन तुलसी विवाह का विशेष महत्व होता है। भगवान विष्णु के भक्त इस दिन दीपदान करते हैं, कथा सुनते हैं और भगवान से सुख, समृद्धि तथा मोक्ष की कामना करते हैं।
पंडित डॉ. नागेंद्र नारायण शर्मा ने बताया कि इस व्रत से व्यक्ति के मन, वचन और कर्म की शुद्धि होती है तथा उसे चारों पुरुषार्थ — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — की प्राप्ति होती है।
।। हरि शरणं — हरि नामं — हरि भक्ति ही परम मोक्ष का द्वार है।।
।। देवउठनी एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएं ।।
।। नाड़ीवैद्य पंडित डॉ. नागेंद्र नारायण शर्मा।।

