कोरबा में बढ़ा विस्थापन का दर्द — कोयला खदानों और बांगो बांध से उजड़ रहे गाँव, भविष्य पर गहराता संकटप्रदेश स्तरीय विस्थापन पीड़ितों का महासम्मेलन होगा आयोजित — छत्तीसगढ़ बचाव आंदोलन ने दिया समर्थन






त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ***/ कोरबा, 15 अक्टूबर 2025।
कोरबा जिला आज प्रदेश के सबसे बड़े औद्योगिक और खनन केंद्र के रूप में जाना जाता है, परंतु यही विकास अब स्थानीय निवासियों के जीवन में विनाश का प्रतीक बनता जा रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम कोल इंडिया लिमिटेड की सहयोगी कंपनी एसईसीएल (SECL) की मेगा कोयला परियोजनाओं के निरंतर विस्तार, हसदेव जंगल की अंधाधुंध कटाई, और बांगो बांध से विस्थापित परिवारों की अनदेखी ने भू-विस्थापन की पीड़ा को गहरा कर दिया है।
जिले में आयोजित एक पत्रकार वार्ता में वक्ताओं ने कहा कि आज कोरबा में विकास की कीमत इंसान और पर्यावरण दोनों चुका रहे हैं। 1960 के दशक से लेकर अब तक हुए भूमि अधिग्रहण और विस्थापन ने हजारों परिवारों को उजाड़ दिया, जबकि आज भी अधिकांश प्रभावितों को न तो उचित मुआवजा मिला है, न रोजगार, न ही स्थायी पुनर्वास।
🌾 कृषि भूमि का विनाश और खाद्य संकट की आहट
लगातार हो रहे खनन कार्यों से कोरबा की उपजाऊ कृषि भूमि नष्ट होती जा रही है। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि एसईसीएल विस्थापन के नाम पर जीवन की जड़ें उखाड़ रहा है, वहीं हसदेव नदी और आसपास के वनों के विनाश से जल संकट और पर्यावरणीय असंतुलन भी तेजी से बढ़ रहा है।
यदि यही स्थिति जारी रही, तो आने वाले वर्षों में कोरबा के खाद्य सुरक्षा और जल संसाधन दोनों पर गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा।
⚒️ रोजगार और खदान बंदी का दोहरा झटका
कोयला खदानों पर निर्भर लाखों परिवार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपनी रोज़ी-रोटी कमाते हैं। लेकिन आंदोलनकारियों का कहना है कि आने वाले 15-20 वर्षों में जब ये खदानें बंद होंगी, तब कोरबा की नई पीढ़ी बेरोजगारी के अंधकार में फंस जाएगी।
खनन से विस्थापन और खदानों की समाप्ति — दोनों ही हालात कोरबा के युवाओं के भविष्य के लिए गंभीर खतरा हैं।
📜 भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 का उल्लंघन
भू-अर्जन, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा एवं पारदर्शिता के अधिकार अधिनियम 2013 के प्रावधानों का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है।
आंदोलनकारियों ने कहा कि 20 से 40 साल पुराने अर्जन मामलों में अभी तक रोजगार या पुनर्वास नहीं मिला है, बल्कि बलपूर्वक ग्राम खाली कराए जा रहे हैं।
धारा 101 के अनुसार, अर्जित भूमि यदि 5 वर्षों तक अनुपयोगी रहे तो उसे मूल किसानों को लौटाना अनिवार्य है — किंतु उद्योगों पर कार्रवाई करने के बजाय किसानों के अधिकारों को कुचला जा रहा है।
👨🌾 छोटे खातेदार सबसे अधिक प्रभावित
पहले प्रत्येक खाते पर रोजगार देने का नियम था, लेकिन अब इसे बदलकर दो एकड़ पर एक रोजगार का प्रावधान कर दिया गया, जिससे छोटे खातेदार विस्थापित पूरी तरह बेरोजगार हो गए।
बताया गया कि एक मामले में उच्च न्यायालय की डबल बेंच ने रोजगार देने का आदेश दिया, परंतु एसईसीएल उसे लागू करने से इंकार कर रहा है।
🔥 आंदोलन होगा निर्णायक — प्रदेश स्तरीय सम्मेलन की तैयारी
वक्ताओं ने कहा कि अब यह संघर्ष केवल मुआवजे या नौकरी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह कोरबा के अस्तित्व और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की लड़ाई बन चुका है।
इस संबंध में प्रदेश स्तरीय भू-विस्थापितों का महासम्मेलन कोरबा में आयोजित किया जाएगा, जिसमें देशभर के किसान आंदोलन से जुड़े नेता और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल होंगे और आगामी रणनीति तय करेंगे।
छत्तीसगढ़ बचाव आंदोलन ने भी कोरबा में चल रहे भू-विस्थापितों के संघर्ष को समर्थन देते हुए कहा है कि अब एसईसीएल को केवल मुनाफा नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी निभानी होगी।





