October 17, 2026

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भगवान विष्णु के करवट बदलने का पावन पर्व, 3 सितंबर को मनाई जाएगी परिवर्तिनी एकादशी

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त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ***/ कोरबा। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की परिवर्तनी एकादशी का व्रत इस वर्ष 3 सितंबर 2025, दिन बुधवार को विधिवत रूप से रखा जाएगा। पंचांग गणना के अनुसार यह एकादशी तिथि 3 सितंबर की प्रातः 3 बजकर 53 मिनट से प्रारंभ होकर 4 सितंबर की प्रातः 4 बजकर 21 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार व्रत 3 सितंबर को ही संपन्न होगा, जबकि पारण 4 सितंबर गुरुवार को मध्यान्ह 1 बजकर 36 मिनट से सायं 4 बजकर 7 मिनट के बीच किया जाएगा।

व्रत एवं महत्व

धार्मिक मान्यता के अनुसार परिवर्तिनी एकादशी को भगवान विष्णु करवट बदलते हैं। इसी कारण इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। इस दिन श्रीविष्णु के वामन स्वरूप की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। भक्तजन उपवास रखते हुए रातभर जागरण कर भजन-कीर्तन करते हैं और दान-पुण्य से पापों का क्षय करते हैं। शास्त्रों में वर्णित है कि इस एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को अश्वमेध यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है।

व्रत कथा

महाभारत कालीन प्रसंग के अनुसार, अर्जुन ने श्रीकृष्ण से भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी का महत्व पूछा था। तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि यह जयन्ती या परिवर्तिनी एकादशी है। इसकी कथा सुनने मात्र से ही पाप नष्ट हो जाते हैं और मनुष्य स्वर्ग का अधिकारी बन जाता है।

त्रेतायुग में बलि नामक असुर अपने तप, दान और भक्ति से स्वर्ग पर अधिकार कर बैठा था। देवताओं के आग्रह पर भगवान विष्णु वामन अवतार लेकर राजा बलि के पास पहुंचे और तीन पग भूमि दान में मांगी। बलि ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। तब भगवान ने विराट स्वरूप धारण कर एक पग से धरती, दूसरे पग से आकाश नाप लिया और तीसरा पग राजा बलि के मस्तक पर रख दिया। इस प्रकार भगवान ने देवताओं का उद्धार किया और बलि को पाताल लोक भेज दिया।

भगवान विष्णु ने आश्वासन दिया कि वे सदैव बलि के साथ रहेंगे। इसीलिए भाद्रपद शुक्ल एकादशी को एक प्रतिमा बलि के पास रहती है और दूसरी प्रतिमा क्षीरसागर में शेषनाग पर शयन करती है। इसी दिन से श्रीविष्णु करवट बदलते हैं।

कथा का संदेश

कथा से यह संदेश मिलता है कि दान करने के बाद अभिमान नहीं करना चाहिए। राजा बलि ने दान में तो सर्वस्व दे दिया, परंतु अभिमान के कारण पाताल भेजे गए। इससे स्पष्ट है कि किसी भी कार्य में अति करना हानिकारक होता है।

धार्मिक अनुष्ठान, उपवास, पूजन और जागरण के साथ यह पर्व भक्तों के लिए पापों से मुक्ति और पुण्य प्राप्ति का अवसर माना जाता है।

✍🏻 नाड़ीवैद्य पंडित डॉ. नागेंद्र नारायण शर्मा

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