“भोजली दाई के भक्ति में रंगाय ग्राम कोराई – खोला नदी में उमड़ी आस्था की लहर”नौ दिन की पूजा-आराधना, भजन-कीर्तन और लोकगीतों से गूंजा गांव, विसर्जन में भावनाओं का उमड़ा सैलाब


त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा (छत्तीसगढ़)।
छत्तीसगढ़ की धरती पर सजीव लोकपरंपराओं में से एक, भोजली तिहार का इस वर्ष ग्राम कोराई में भव्य और भावपूर्ण आयोजन हुआ। पूरे गांव ने नौ दिन तक श्रद्धा और उल्लास के साथ भोजली दाई की आराधना कर, एकता और संस्कृति का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया।
नौ दिन का भक्ति पर्व
सावन के शुभ अवसर पर गांव के चौक में स्थापित भोजली दाई की प्रतिमा के समक्ष रोज सुबह-शाम आरती, पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन और छत्तीसगढ़ी लोकगीतों की मधुर धुन गूंजती रही। महिलाएं फूल, दूब, नारियल और घर में बने प्रसाद अर्पित करतीं, तो बच्चे और बुजुर्ग पूरे उत्साह से आरती में शामिल होते। इन नौ दिनों में गांव का हर कोना भक्ति और उल्लास के रंग में रंगा रहा।
विसर्जन दिवस का उत्सव
दसवें दिन की सुबह गांव में एक अलग ही रौनक देखने को मिली। भोजली दाई को फूल-मालाओं, रंग-बिरंगे वस्त्रों और आभूषणों से सजाया गया। ढोलक, मंजीरा, बाजा-गाजा और भक्तिमय गीतों के बीच भव्य शोभायात्रा निकली, जिसमें महिलाएं सिर पर भोजली की टोकरी रखे पारंपरिक गीत गाती चल रही थीं। पुरुष और युवा जयकारे लगाते, नाचते-गाते आगे बढ़ रहे थे।
खोला नदी में विसर्जन और भावनाओं का उमड़ना
शोभायात्रा खोला नदी के घाट पहुंची, जहां पहले विधिवत आरती की गई, नारियल फोड़ा गया और गांव की सुख-शांति, समृद्धि और अच्छी वर्षा की प्रार्थना की गई। विसर्जन के समय कई श्रद्धालुओं की आंखें भावनाओं से भर आईं। यह क्षण केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामुदायिक एकजुटता और परंपरा का सजीव प्रतीक था।
परंपरा, प्रकृति और एकता का संगम
भोजली तिहार केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। यह कृषि और प्रकृति के प्रति आभार, सामाजिक मेल-मिलाप और संस्कृति संरक्षण का पर्व है। विसर्जन के बाद ग्राम कोराई के लोगों ने घाट की सफाई कर, आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया।
भोजली तिहार का महत्व
भोजली पर्व में सावन के पहले सप्ताह में महिलाएं गेहूं, जौ या धान के बीज बोती हैं और नौ दिनों तक उनकी पूजा करती हैं। यह हरियाली, फसल और समृद्धि का प्रतीक है। मान्यता है कि भोजली माता की कृपा से गांव में वर्षा, अनाज और सुख-शांति बनी रहती है। विसर्जन के दौरान गाए जाने वाले लोकगीतों में बहनों का स्नेह, खेती का महत्व और प्रकृति की सुंदरता झलकती है —
“भोजली गे बोवाई गे मइया, बरखा देय धरती हरी भईया…”
इस वर्ष का भोजली उत्सव ग्राम कोराई में न केवल धार्मिक आस्था का पर्व रहा, बल्कि यह गांव की सामूहिक शक्ति, सांस्कृतिक गर्व और लोकपरंपराओं के संरक्षण का प्रेरणादायक उदाहरण बनकर इतिहास में दर्ज हो गया।

