कटघोरा बायपास की 2.50 किमी सड़क बनाने जमीन तो मिली पर फिर से जारी करनी होंगी निविदा



* लागत थी ₹860 करोड़ परंतु ठेका कंपनी का अनुबंध हुआ समाप्त
* अब 6 महीने से अधिक का लगेगा समय
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा गत दिनों भारत सरकार के केंद्रीय मंत्रीमंडल में सड़क, परिवहन और राजमार्ग, जहाजरानी, जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री नितिन गड़करी ने अनेक महती सभाओ में अत्यंत ही गर्व के साथ यह कहा था की उनका एक मात्र लक्ष्य यह हैं, की राष्ट्र के कोने-कोने को अत्यंत ही सुदृढ़ और सुविधाजनक आवस्यकता के अनुरूप मजबूत और सुरक्षित सडको के संपर्क से जोड़कर ही विकास की गति को तेज किया जा सकता हैं। इस हेतु नागरिक अपनी सामूहिक लाभकारी योजनाओ को लाकर अनुमोदन प्राप्त कर सकेंगे। योजना जाहे जितनी भी व्यय युक्त हो उनके लिये वित्त असुविधा आने नहीं दी जायेगी और इसी के तहत कोरबा सहित छत्तीसगढ़ के निवासीयो में भी उमंग भरी आशा का संचार हुआ। कोरबा जिले में भी भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया) की फोरलेन सड़को का निर्माण भी द्रुत गति से प्रारंभ हुआ, किंतु यह दुखद हैं की जहां सैकड़ों हजारो किलोमीटर की लंबी-चौड़ी सड़के मूर्त रूप ले रही हैं वही दुसरी ओर कोरबा जिले की कटघोरा-पतरापाली अंतर्गत प्रस्तावित 38.8 किलोमीटर फोरलेन सड़क के बीच ग्राम जुराली के पास मात्र लगभग 2.5 किलोमीटर लंबी सड़क का कार्य वर्षो से रेंग रहा हैं। यहाँ पर बनाई जाने वाली प्रस्तावित सड़क निर्माण हेतु माटीपुत्रो की हरियाली बिखेरती उपजाऊ भूमि का हिस्सा भी आता हैं। इन माटीपुत्रो का खुला आरोप हैं की उन्हें सरकार की नीति, नियम और घोषणा के अनुरूप मुआवजा चाहिए, किंतु माटीपुत्र परंपरागत किसान शासन, प्रशासन, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण, लोक सड़क निर्माण विभाग एवं सड़क निर्माण ठेका निजी कंपनी के मध्य लगातार उछाल-उछाल कर फेंकी जा रही गेंद का रूप ले चुके हैं।
इस प्रस्तावित फोरलेन सड़क के अल्प हिस्से के निर्माण की दुखद कहानी में यह उल्लेखित हैं की एक और जहां प्रभावित मूलभूमि स्वामियों का आरोप हैं की उन्हें नियमानुसार उनकी जमीनों का मुआवजा मिल जाए। इसमें कोई पेंच-अड़ंगे ना फंसाये जाए किंतु संबंधित विभाग के कतिपय मगरूर अधिकारी निर्माण कार्य को आगे बढ़ाने में अभिरुचि नहीं दिखा रहे। यही कारण हैं की इन जमीनों पर माटीपुत्रो की इच्छा और सहमति के विपरीत प्रभावित जमीनों का 4 दिन पहले प्रशासन ने भयपूर्ण वातावरण निर्मित कर सीमांकन कराकर रेखांकन भी निपटा लिये जाने की जानकारी मिली हैं। इस संबंध में प्रभावित माटीपुत्रो का आरोप हैं की सक्षम न्यायिक पदाधिकारीयों के द्वारा उनके पक्ष में आदेश भी पारित हो चुके हैं, किंतु हठदर्मीयता के शिकार इस दुविधा को फिर से दोहराने की तैयारी में हैं। वही दुसरी और सड़क निर्माण का कार्य जिस निजी ठेकेदार को आबंटित किया गया था उसने स्पष्ट कह दिया हैं, की उसके ठेका कार्य की अवधि समाप्त हो चुकी हैं, अब वह आगे कार्य नहीं करेगा। अब इसके पश्चात निर्माण कार्य की निविदा पुनः आवेदन करने की स्थिति उत्पन्न होना बताया जा रहा हैं। इसके अलावा ग्राम जुराली के प्रस्तावित सड़क निर्माण प्रभावित 111 ग्रामीणों का मुआवजा प्रकरण भी लंबित हैं और उन्होंने अपनी जमीन अब तक भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को सड़क निर्माण कार्य करने हेतु नहीं सौंपी हैं। जिसके कारण वहा सड़क निर्माण का कार्य अधर में लटका हुआ हैं। ऐसा बताया गया हैं।
यह भी बताया जा रहा हैं की सड़क की अहिरन नदी पर भी पुल निर्माण का कार्य पूर्ण कर लिया गया है, लेकिन पुल के दोनों ओर पुल पहुंच सड़क मार्ग नहीं बन पाई है। इसमें करीब ढाई किलोमीटर सड़क बननी बाकी है।
जमीन का मुआवजा विवाद लंबे समय तक चलने के कारण ठेका कंपनी ने अनुबंध ही समाप्त कर दिया हैं। इसकी वजह से कटघोरा बायपास मार्ग पर अभी आवाजाही नहीं हो रही है। वर्तमान में लोगों को कटघोरा नगर और पीडब्ल्यूडी की बायपास सड़क पर ही आवाजाही करनी पड़ रही है। हाईवे की बायपास सड़क बनने से कोरिया और अंबिकापुर की ओर जाने वाले लोगों को शहर की भीड़ में प्रवेश नहीं करना पड़ेगा। यह सड़क हनुमानगढ़ी के पास कटघोरा-अंबिकापुर हाईवे से जुड़ेगी। बायपास की करीब 8 किलोमीटर सड़क अभी बंद है। लोगों को ग्राम सुतर्रा के पास से ही कटघोरा नगर आना जाना पड़ता है।
111 ग्रामीणों के मुआवजा का मामला आर्बिट्रेटर बिलासपुर कमिश्नर के यहां चल रहा था। आर्बिट्रेटर ने ग्रामीणों के पक्ष में फैसला सुनाया। इसे एनएचएआई ने जिला कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उसे जीत मिली। इसकी वजह से ही प्रशासन ने जमीन को सौंपने के लिए नापजोख कराई है। सड़क बनाने में कम से कम 6 महीने से अधिक का समय लग सकता है।
* ग्राम जुराली के ग्रामीणों को पुनः जाना पडेगा मुआवजा के लिए आर्बिट्रेटर के पास
ग्राम जुराली के 111 ग्रामीणों को मुआवजा के लिए अब फिर से आर्बिट्रेटर के पास जाना पड़ेगा। मुआवजा में किसी तरह का सुधार करने का पावर आर्बिट्रेटर कमिश्नर बिलासपुर को ही है। एसडीएम इस पर निर्धारण नहीं कर सकते।
* 3.54 लाख का मुआवजा नए निर्धारण में हुआ 72 लाख
ग्राम जुराली के एक ग्रामीण का मुआवजा सिर्फ 3 लाख 54 हजार बना परंतु आर्बिट्रेटर के आदेश के बाद मुआवजा 72 लाख रुपए निर्धारण हुआ। जुराली नगर पालिका क्षेत्र है। यहां के ग्रामीणों का कहना है कि हमें नियम के अनुसार ही मुआवजा मिलना चाहिए। इसकी वजह से ही हम विरोध कर रहे हैं। जुगाली के ही एक अन्य ग्रामीण का मुआवजा पहले सिर्फ 46 हजार था। बाद में 10 लाख 84 हजार का बना। ग्रामीण वर्ग मीटर के हिसाब से मुआवजा की मांग कर रहे हैं।
* एसडीएम ने 40 किसानों का किया था मुआवजा निर्धारण
ग्रामीणों के पक्ष में कमिश्नर का फैसला आने के बाद एसडीएम कटघोरा ने 40 ग्रामीणों का मुआवजा निर्धारण किया था। इससे मुआवजा की राशि 50 गुना तक बढ़ गई थी। इस निर्णय को एनएचएआई ने जिला कोर्ट में चुनौती दी थी। इन कारणों से मामला लंबित होने से निर्माण कार्य प्रभावित हो रहा हैं उधर निर्माण लागत भी बेतहाशा बढ़ती जा रही हैं। जिससे आम जन इसके निर्माण लाभ से वंचित हैं।

