August 14, 2026

त्रिनेत्र टाईम्स

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अहिरन नदी बनी ‘गंदे नाले’ में तब्दील! प्रदूषण से जलस्रोत बेहाल, प्रशासन की निष्क्रियता के बीच ग्रामीणों ने खुद उठाया फावड़ा

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सीवरयुक्त पानी से दूषित हो रही जीवनदायिनी नदी, 117 वर्ष पुराने तालाब को बचाने के लिए ग्रामीणों ने शुरू किया जनअभियान
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**// कटघोरा। कभी क्षेत्र की जीवनरेखा मानी जाने वाली अहिरन नदी आज प्रदूषण की मार झेल रही है। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि नगर पालिका कटघोरा से निकलने वाला गंदा एवं सीवर मिश्रित पानी बिना समुचित उपचार के सीधे नदी में छोड़ा जा रहा है, जिससे नदी का जल लगातार दूषित होता जा रहा है। हालात ऐसे बन गए हैं कि जिस नदी के पानी पर कभी गांवों की प्यास, खेती और पशुधन की जरूरतें निर्भर थीं, आज वही नदी लोगों के लिए चिंता और संकट का कारण बनती जा रही है।
ग्राम डुडगा सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में इस मुद्दे को लेकर भारी नाराजगी देखी जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से नदी में प्रदूषण बढ़ता गया, लेकिन जिम्मेदार विभागों ने समस्या के स्थायी समाधान की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की। परिणामस्वरूप क्षेत्र में जल संकट की आशंका गहराने लगी है।

 

 

जिस नदी ने पीढ़ियों को जीवन दिया, आज वही खुद बचाने की गुहार लगा रही
ग्रामीणों के अनुसार अहिरन नदी और गांव का लगभग 117 वर्ष पुराना ऐतिहासिक तालाब लंबे समय तक क्षेत्र के प्रमुख जल स्रोत रहे हैं। पीढ़ियों से ग्रामीण, पशुधन और खेती-किसानी इसी जल पर निर्भर रहे हैं। लेकिन लगातार बढ़ते प्रदूषण ने इस प्राकृतिक धरोहर की सेहत बिगाड़ दी है।
लोगों का कहना है कि दूषित पानी के कारण नदी का उपयोग दिन-प्रतिदिन कम होता जा रहा है। कई स्थानों पर पानी की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं, जिससे ग्रामीणों की चिंता बढ़ गई है।
प्रशासन का इंतजार छोड़ ग्रामीणों ने खुद संभाली जिम्मेदारी
जब समस्या का समाधान कहीं नजर नहीं आया तो ग्रामीणों ने खुद मैदान में उतरने का फैसला किया। ग्राम डुडगा में ग्रामीणों ने सामूहिक पहल करते हुए वर्षों पुराने तालाब के संरक्षण और गहरीकरण का कार्य शुरू कर दिया है।
जेसीबी मशीनों की मदद और श्रमदान के माध्यम से तालाब को गहरा किया जा रहा है ताकि आगामी बारिश में अधिक मात्रा में जल संचय हो सके। ग्रामीणों का मानना है कि यदि तालाब को समय रहते संरक्षित नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में जल संकट और विकराल रूप ले सकता है।
जल संकट के साथ बढ़ रहा बीमारियों का खतरा
स्थानीय लोगों का कहना है कि दूषित जल का प्रभाव केवल पेयजल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पशुधन और पर्यावरण पर भी पड़ रहा है। स्वच्छ जल की कमी के चलते ग्रामीणों को वैकल्पिक स्रोत तलाशने पड़ रहे हैं। वहीं जलजनित बीमारियों की आशंका भी लगातार बढ़ रही है।
ग्रामीणों का मानना है कि यदि समय रहते नदी को प्रदूषण से मुक्त नहीं कराया गया तो आने वाले समय में क्षेत्र को गंभीर जल संकट और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
ग्रामीणों की चेतावनी— अब नहीं बची तो आने वाली पीढ़ियां भुगतेंगी कीमत
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि अहिरन नदी में छोड़े जा रहे गंदे पानी की तत्काल जांच कराई जाए और प्रदूषण रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं। साथ ही नदी, तालाब और अन्य प्राकृतिक जल स्रोतों के संरक्षण के लिए दीर्घकालिक कार्ययोजना तैयार की जाए।
ग्रामीणों का कहना है कि जल स्रोतों की रक्षा केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं बल्कि सामूहिक दायित्व है, लेकिन जब व्यवस्था मौन हो जाए तो जनता को स्वयं आगे आना पड़ता है। डुडगा के ग्रामीणों द्वारा शुरू किया गया यह अभियान अब पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गया है।

“अहिरन नदी पर मंडराया अस्तित्व का संकट, प्रदूषण से त्रस्त ग्रामीणों ने जल संरक्षण की मुहिम खुद संभाली; प्रशासनिक व्यवस्था पर उठे सवाल”

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