243 लाख की प्रधानमंत्री जनमन सड़क पर उठे बड़े सवाल, एक माह में ही उखड़ने लगी सड़क; ग्रामीण बोले — “क्या कागजों में हुई गुणवत्ता जांच?”



विशेष पिछड़ी जनजाति क्षेत्र के विकास की योजना पर भ्रष्टाचार का साया, डोकरमाना से चिरईझुंझ सड़क निर्माण बना जांच का विषय
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**// कोरबा। प्रधानमंत्री जनमन (PM-JANMAN) योजना के तहत विशेष पिछड़ी जनजाति क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ने के उद्देश्य से बनाई गई सड़क अब गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। कोरबा ब्लॉक अंतर्गत ग्राम पंचायत डोकरमाना से पहाड़ी कोरवा बस्ती चिरईझुंझ तक लगभग 4.62 किलोमीटर लंबी सड़क, जो करीब 243.21 लाख रुपए की लागत से बनाई गई है, निर्माण के कुछ ही समय बाद जगह-जगह से उखड़ने लगी है। सड़क की हालत देखकर ग्रामीणों में भारी नाराजगी और आक्रोश व्याप्त है।
स्थल पर लगे शासकीय बोर्ड के अनुसार यह सड़क प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाअभियान (PM-JANMAN) के अंतर्गत बनाई गई है। बोर्ड में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि सड़क निर्माण कार्य की स्वीकृत राशि 243.21 लाख रुपए है तथा निर्माण कार्य पूर्णता तिथि 2 सितंबर 2025 दर्ज है। वहीं पांच वर्षों के संधारण कार्य के लिए 21.81 लाख रुपए की अतिरिक्त राशि भी निर्धारित की गई है। इसके बावजूद सड़क का एक माह के भीतर उखड़ना निर्माण गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

ग्रामीणों का कहना है कि सड़क बनने के बाद लोगों में खुशी थी कि अब पहाड़ी कोरवा बस्ती तक बेहतर आवागमन सुविधा मिलेगी, लेकिन सड़क की परत उखड़ने और किनारों के टूटने से लोगों की उम्मीदों को झटका लगा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि निर्माण कार्य में गुणवत्ता की अनदेखी की गई और जल्दबाजी में सड़क बनाकर औपचारिकता पूरी कर दी गई।
ग्रामीणों ने सवाल उठाया कि जब सड़क निर्माण के लिए करोड़ों रुपए खर्च किए गए तो आखिर गुणवत्ता नियंत्रण कहां था? क्या सड़क की मोटाई, डामर की मात्रा और बेस लेयर की तकनीकी जांच हुई थी? यदि जांच हुई थी तो सड़क इतनी जल्दी खराब कैसे हो गई?
इंजीनियरों और विभागीय निगरानी पर उठे सवाल
सड़क निर्माण कार्य में विभागीय इंजीनियर, उप अभियंता, एसडीओ एवं गुणवत्ता नियंत्रण टीम की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। निर्माण के दौरान सड़क की लंबाई, चौड़ाई, मोटाई, गिट्टी की परत, डामर मिश्रण और रोलर कम्पेक्शन की तकनीकी जांच की जाती है। सड़क निर्माण में कोर कट मशीन और अन्य माप उपकरणों से सड़क की मोटाई एवं गुणवत्ता की जांच भी की जाती है। इसके बाद ही निर्माण कार्य पूर्ण मानकर भुगतान किया जाता है।
ऐसे में ग्रामीणों का कहना है कि यदि सारी तकनीकी प्रक्रिया पूरी की गई थी तो सड़क एक माह में उखड़ क्यों रही है? क्या अधिकारियों ने निर्माण स्थल का निरीक्षण किया था या केवल कागजों में गुणवत्ता परीक्षण पूरा दिखा दिया गया? ग्रामीणों ने पूरे मामले की उच्च स्तरीय तकनीकी जांच कराने तथा जिम्मेदार ठेकेदार और अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की है।
गांव की सड़कें क्यों बनती हैं भ्रष्टाचार का शिकार?
ग्रामीणों का आरोप है कि दूरस्थ क्षेत्रों में बनने वाली सड़कें अक्सर भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी की भेंट चढ़ जाती हैं। शहरों की सड़कों की तरह गांव की सड़कों पर निगरानी नहीं होती, जिसका फायदा उठाकर कई बार घटिया निर्माण सामग्री का उपयोग किया जाता है। लोगों का कहना है कि प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी योजना का उद्देश्य आदिवासी और दूरस्थ क्षेत्रों का विकास करना है, लेकिन यदि निर्माण कार्य इसी तरह होता रहा तो योजनाओं का वास्तविक लाभ ग्रामीणों तक नहीं पहुंच पाएगा।
स्थानीय लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि सड़क की स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए, निर्माण गुणवत्ता की तकनीकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए और दोषी पाए जाने वालों पर कठोर कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में जनहित की योजनाओं में लापरवाही न हो।
अब सबकी नजर प्रशासन और संबंधित विभाग पर टिकी है कि करोड़ों रुपए की इस सड़क में सामने आई खामियों पर क्या कार्रवाई होती है और विशेष पिछड़ी जनजाति क्षेत्र के लोगों को कब तक टिकाऊ एवं गुणवत्तापूर्ण सड़क सुविधा मिल पाती है।


