“स्वदेशी अपनाओ, देश मजबूत बनाओ” : विदेशी उत्पादों के बहिष्कार और भारतीय वस्तुओं को अपनाने की मुहिम तेज



त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**// नई दिल्ली/कोरबा। सोशल मीडिया और विभिन्न जनमाध्यमों में इन दिनों स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने और विदेशी उत्पादों के बहिष्कार को लेकर एक बड़ा जनजागरण अभियान तेजी से चर्चा में है। लोगों के बीच वायरल हो रहे संदेशों में भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने, किसानों को लाभ पहुंचाने और युवाओं को रोजगार देने के लिए स्वदेशी उत्पादों के उपयोग पर जोर दिया जा रहा है।
इस अभियान में दावा किया जा रहा है कि यदि देशवासी विदेशी कंपनियों के शीतल पेय और उत्पादों की बजाय स्थानीय उत्पादों और भारतीय वस्तुओं को प्राथमिकता दें, तो देश की बड़ी धनराशि विदेश जाने से रोकी जा सकती है। संदेश में विशेष रूप से गन्ने का रस, नारियल पानी, ताजे फलों का जूस तथा स्थानीय खाद्य उत्पादों को अपनाने की अपील की गई है।
सोशल मीडिया पर प्रसारित संदेशों में कहा गया है कि विदेशी कंपनियों के उत्पादों पर अत्यधिक निर्भरता भारतीय छोटे व्यापारियों, किसानों और स्थानीय उद्योगों को प्रभावित करती है। वहीं यदि लोग स्थानीय और स्वदेशी उत्पादों का अधिक उपयोग करें, तो देश के भीतर रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है।
अभियान में कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नामों का उल्लेख करते हुए लोगों से अपील की जा रही है कि वे भारतीय विकल्पों को प्राथमिकता दें। संदेश में यह भी कहा गया है कि केवल उपभोग की आदतों में बदलाव लाकर देश की आर्थिक स्थिति को अधिक सशक्त बनाया जा सकता है।
हालांकि आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी देश की अर्थव्यवस्था केवल बहिष्कार से नहीं, बल्कि उत्पादन क्षमता, निर्यात, तकनीकी विकास, रोजगार सृजन और उपभोक्ता संतुलन से मजबूत होती है। विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि भारत में कार्यरत कई विदेशी कंपनियां प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाखों लोगों को रोजगार भी प्रदान करती हैं। ऐसे में उपभोक्ताओं को भावनाओं के साथ-साथ गुणवत्ता, स्वास्थ्य और आर्थिक व्यवहार्यता को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेना चाहिए।
फिर भी “वोकल फॉर लोकल” और “मेक इन इंडिया” जैसी अवधारणाओं के बाद देश में स्वदेशी उत्पादों के प्रति जागरूकता लगातार बढ़ी है। छोटे व्यापारियों, हस्तशिल्प, स्थानीय खाद्य पदार्थों और भारतीय ब्रांडों को बढ़ावा देने की सोच अब जनआंदोलन का रूप लेती दिखाई दे रही है।
देशभर में चल रही इस चर्चा ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारतीय उपभोक्ता अपनी खरीदारी की आदतों में बदलाव कर स्थानीय उद्योगों और किसानों को नई ताकत दे सकते हैं। फिलहाल सोशल मीडिया पर यह मुहिम तेजी से लोगों का ध्यान आकर्षित कर रही है और स्वदेशी बनाम विदेशी उत्पादों पर नई बहस छिड़ गई है।


