मजदूरी से आत्मनिर्भरता तक: बालको की ‘उन्नति’ परियोजना से गंगोत्री बनीं ‘मशरूम दीदी’, बदल दी अपनी और कई महिलाओं की ज़िंदगी



त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ****//** कोरबा। वेदांता समूह की कंपनी Bharat Aluminium Company Limited (बालको) की सामुदायिक विकास पहल ‘उन्नति’ परियोजना ग्रामीण महिलाओं के जीवन में परिवर्तन की नई कहानी लिख रही है। इसी पहल से जुड़कर लालघाट क्षेत्र की निवासी गंगोत्री विश्वकर्मा ने मजदूरी की कठिन जिंदगी से निकलकर मशरूम उत्पादन के माध्यम से आत्मनिर्भरता की नई पहचान बनाई है। आज लोग उन्हें स्नेहपूर्वक ‘मशरूम दीदी’ के नाम से जानते हैं।
कुछ वर्षों पहले तक गंगोत्री विश्वकर्मा का जीवन रोज़ की मजदूरी पर निर्भर था। यदि सुबह काम मिल जाता तो घर का चूल्हा जलता, अन्यथा परिवार के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो जाता। बच्चों के भविष्य और घर की जिम्मेदारियों की चिंता उन्हें हमेशा परेशान करती थी। लेकिन वर्ष 2019 उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ, जब वे बालको की ‘उन्नति’ परियोजना के माध्यम से जय मां हर्षिता स्व-सहायता समूह से जुड़ीं और मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण प्राप्त किया।
प्रशिक्षण के बाद उन्होंने उसी वर्ष मशरूम की खेती शुरू की। शुरुआत में उन्होंने 16 बैग तैयार किए, लेकिन पहली बार में केवल दो बैग में ही मशरूम उग पाए। हालांकि उन्होंने इसे असफलता नहीं माना, बल्कि सीख के रूप में स्वीकार करते हुए तकनीक को बेहतर ढंग से समझा और फिर से प्रयास किया। उनके निरंतर प्रयास और मेहनत का परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे उत्पादन बढ़ता गया और आज उनकी मशरूम इकाई में करीब 200 बैग तक उत्पादन हो रहा है।
मशरूम उत्पादन की खासियत यह है कि इसकी खेती में 20 से 25 दिनों के भीतर उत्पादन शुरू हो जाता है और सप्ताह के अंतराल पर तीन बार फसल मिलती है। उत्पादन को लगातार बनाए रखने के लिए गंगोत्री रोज़ लगभग दो नए बैग तैयार करती हैं। वैज्ञानिक पद्धति से पैरा-कुट्टी को भिगोकर हल्की नमी में सुखाया जाता है और पोषण के लिए बायो-स्टिमुलेंट पाउडर तथा रोगों से बचाव के लिए फॉर्मूलिन पाउडर का उपयोग किया जाता है, जिससे अच्छी और सुरक्षित पैदावार प्राप्त होती है।
गंगोत्री अपनी पूरी उपज स्वयं बाजार में बेचती हैं। शुरुआत के कठिन समय में बालको के कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) विभाग से उन्हें लगातार सहयोग और मार्गदर्शन मिला, जिससे उनका आत्मविश्वास भी बढ़ता गया। आज वे स्वयं बीज मंगवाकर अपने समूह की अन्य महिलाओं को भी उपलब्ध कराती हैं और जय मां हर्षिता स्व-सहायता समूह की सचिव के रूप में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
कोविड काल उनके परिवार के लिए बेहद कठिन रहा। उस दौरान उनके पति की आय लगभग बंद हो गई थी और परिवार आर्थिक संकट से जूझ रहा था। ऐसे समय में मशरूम की खेती ही उनके परिवार का सहारा बनी। इसी आय से उन्होंने घर का खर्च चलाया और धीरे-धीरे बचत भी शुरू की। बाद में इसी बचत और मशरूम की कमाई से उन्होंने एक ऑटो खरीदा, जिसे आज उनके पति चलाते हैं और समय मिलने पर गंगोत्री के काम में भी सहयोग करते हैं।
आज गंगोत्री विश्वकर्मा को मशरूम उत्पादन से औसतन प्रति माह लगभग 15 हजार रुपये का लाभ हो रहा है। इससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है और अब वे अपने बच्चों की पढ़ाई को लेकर भी निश्चिंत हैं। उनका सपना है कि आने वाले समय में वे अपने उत्पादन को 200 बैग से बढ़ाकर 5000 बैग तक ले जाएं, ताकि उनके साथ-साथ अन्य महिलाएं भी आत्मनिर्भर बन सकें।
गंगोत्री की यह यात्रा इस बात का जीवंत उदाहरण है कि सही प्रशिक्षण, संस्थागत सहयोग और दृढ़ संकल्प के साथ एक साधारण महिला भी अपने जीवन की दिशा बदल सकती है। बालको की ‘उन्नति’ परियोजना आज ऐसी ही कई प्रेरक कहानियों को जन्म दे रही है, जो ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक आत्मनिर्भरता और सम्मानजनक जीवन की ओर अग्रसर कर रही हैं।


