**20 साल से निगम की ज़मीन पर दुकान, कानून सोता रहा!






नगर निगम कॉलोनी में खुलेआम अवैध कारोबार, प्रशासन की चुप्पी ने बढ़ाए कब्जाधारियों के हौसले**
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ****//** कोरबा नगर पालिक निगम कोरबा की संपत्ति पर बीते पूरे 20 वर्षों से अवैध रूप से दुकान बनाकर उसका संचालन किया जाना न केवल कानून का मज़ाक है, बल्कि नगर निगम और प्रशासनिक तंत्र की घोर लापरवाही का जीता-जागता उदाहरण बन चुका है। नगर निगम कॉलोनी के भीतर, भानु साहू के नाम पर आवंटित मकान की आड़ में निगम की लगभग तीन डिसमिल सार्वजनिक भूमि पर अवैध दुकान खड़ी कर दी गई, जो पिछले दो दशकों से निर्बाध रूप से संचालित हो रही है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह अवैध दुकान नगर निगम के ही एक कर्मचारी के भाई छेदी साहू द्वारा संचालित की जा रही है, जिससे पूरे मामले में अंदरूनी संरक्षण और मिलीभगत की आशंका और भी गहरी हो जाती है। सवाल यह उठता है कि जब कब्जाधारी का सीधा संबंध निगम से जुड़े व्यक्ति से है, तो क्या इसी कारण 20 वर्षों तक किसी ने कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं दिखाई?
स्थानीय कॉलोनीवासियों का कहना है कि यह दुकान अब केवल अवैध निर्माण नहीं रही, बल्कि असामाजिक गतिविधियों का स्थायी अड्डा बन चुकी है। यहां दिन-रात संदिग्ध लोगों का जमावड़ा लगा रहता है, जिससे कॉलोनी का माहौल भयग्रस्त बना हुआ है। महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को आए दिन असुरक्षा का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन प्रशासन आंखें मूंदे बैठा है।

निवासियों के अनुसार जिस भूमि पर यह दुकान खड़ी है, वह नगर निगम की सार्वजनिक जमीन है, जिसका उपयोग कॉलोनीवासियों की सुविधा के लिए होना था। नियमों के अनुसार इस जमीन पर किसी भी प्रकार का निजी निर्माण या व्यवसायिक गतिविधि पूरी तरह अवैध है। इसके बावजूद 20 वर्षों तक दुकान का चलना इस बात का प्रमाण है कि या तो अधिकारियों को सब पता है, या फिर सब कुछ जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस अवैध दुकान की शिकायतें कई बार मौखिक रूप से की गईं, लेकिन न तो अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई हुई और न ही किसी प्रकार का नोटिस जारी किया गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि नियम केवल कागजों में हैं, जमीन पर उनका कोई असर नहीं है।
अब नागरिकों का सब्र जवाब देने लगा है। कॉलोनीवासियों ने चेतावनी दी है कि यदि तत्काल प्रभाव से दुकान को सील कर अवैध कब्जा नहीं हटाया गया, तो वे
➡ नगर निगम कार्यालय का घेराव करेंगे,
➡ कलेक्टर से लिखित शिकायत करेंगे,
➡ और पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय एवं निष्पक्ष जांच की मांग करेंगे।
नागरिकों ने यह भी साफ कहा है कि भविष्य में यदि दुकान या वहां मौजूद असामाजिक तत्वों के कारण कोई अप्रिय घटना घटती है, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी नगर निगम प्रशासन और संबंधित अधिकारियों की होगी।
अब सवाल सीधा और तीखा है—
👉 क्या नगर निगम अपनी ही जमीन को 20 साल बाद भी अतिक्रमण मुक्त करा पाएगा?
👉 क्या निगम कर्मचारी के रिश्तेदार पर कार्रवाई होगी या मामला फिर दबा दिया जाएगा?
👉 या फिर यह अवैध दुकान प्रशासनिक संरक्षण की मिसाल बनकर यूं ही चलती रहेगी?
यह मामला अब सिर्फ अतिक्रमण का नहीं, बल्कि नगर निगम की साख, कानून-व्यवस्था और आम नागरिकों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन चुका है, जिस पर अब कार्रवाई नहीं हुई तो जनआक्रोश और तेज होना तय है।





