बिहार में संतान की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और सुरक्षा की कामना से मनाया जाता है विशेष पर्व ‘बेटा जितिया’”


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त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ****/ भारत की सांस्कृतिक विविधता में हर पर्व और व्रत का विशेष स्थान है। बिहार में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण व्रत है जिसे आदरपूर्वक ‘बेटा जितिया व्रत’ कहा जाता है। यह व्रत माताओं द्वारा अपने पुत्रों की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और सुरक्षा की कामना से मनाया जाता है।
दरअसल, ‘बेटा जितिया पर्व’ जीवितपुत्रिका व्रत या जितिया व्रत कहलाता है। यह पर्व विशेष रूप से अश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को निर्जला व्रत के रूप में मनाया जाता है। माताएं संतान की भलाई के लिए पूरे दिन व्रत रखती हैं और भगवान जीवन्तवाहन व माता पार्वती की विधिपूर्वक पूजा करती हैं।
✅ व्रत का उद्देश्य:
इस व्रत का मुख्य उद्देश्य पुत्रों की लंबी आयु, सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य व सुरक्षा सुनिश्चित करना है। माताएं भगवान से पुत्रों के उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना करती हैं और अपने ह्रदय से उन्हें आशीर्वाद देती हैं। यह पर्व पारिवारिक प्रेम, संस्कार और भाईचारे को और अधिक सशक्त बनाता है।
📋 कैसे मनाया जाता है:
व्रती महिलाएं सूर्योदय से पहले स्नान करके पवित्र भोजन ग्रहण करती हैं, जिसे ‘नहाय-खाय’ कहा जाता है।
उसके बाद पूरे दिन निर्जला व्रत रखती हैं, अर्थात बिना जल के पूरे 24 घंटे व्रत करती हैं।
व्रत के दौरान माता पार्वती और भगवान जीवन्तवाहन की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है।
🌺 परंपरा:
व्रत पूरा होने के बाद माताएं अपने पुत्रों के सिर पर विशेष आशीर्वाद स्वरूप तेल लगाती हैं। इसके साथ ही लाल धागे से सजाकर पुत्रों की लंबी आयु, स्वास्थ्य व समृद्धि की कामना करती हैं। यह परंपरा परिवार व समाज में सौहार्द, प्रेम व समरसता का प्रतीक बन चुकी है।
📚 सांस्कृतिक एवं सामाजिक संदेश:
‘बेटा जितिया व्रत’ केवल एक पारंपरिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह हमारे संस्कारों, नैतिक मूल्यों व सामाजिक एकता का प्रतीक है। इसे सही भाव व उद्देश्य के साथ मनाना चाहिए ताकि यह परंपरा आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रूप से बनी रहे। साथ ही, यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि पुत्र ही नहीं, पुत्री को भी समान अधिकार व आशीर्वाद प्राप्त होने चाहिए।
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‘बेटा जितिया व्रत’ बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का अनमोल हिस्सा है, जो संतान की लंबी आयु, सुख-समृद्धि व सुरक्षा के लिए माताओं द्वारा प्रेम व श्रद्धा से मनाया जाता है। यह पर्व परिवार व समाज में प्रेम व एकता की भावना को बढ़ाता है। इसे भक्ति, संस्कार व सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ मनाना चाहिए ताकि हमारी संस्कृति का उज्जवल भविष्य सुनिश्चित हो सके।

