February 13, 2026

त्रिनेत्र टाईम्स

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“पितृ पक्ष का महत्व: पूर्वजों की याद में तर्पण-पिंडदान कर श्रद्धा व कृतज्ञता व्यक्त करने की पावन परंपरा”

 

त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ****/भारतीय संस्कृति में पूर्वजों का विशेष स्थान है। हर वर्ष **आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तक पवित्र पर्व ‘पितृ पक्ष’ मनाया जाता है। यह समय विशेष रूप से अपने पूर्वजों को याद करने, उनके आशीर्वाद को प्राप्त करने और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का शुभ अवसर होता है।
पितृ पक्ष का उद्देश्य केवल पूर्वजों को याद करना नहीं है, बल्कि यह उन्हें सम्मान देने और उनके प्रति अपने कर्तव्यों को समझने का एक अवसर भी है। इस दौरान तीन पीढ़ियों के पितरों के लिए तर्पण व पिंडदान करके उनकी आत्मा की शांति व सुख-समृद्धि की प्रार्थना की जाती है।
पितृ पक्ष क्यों मनाया जाता है:
पूर्वजों को याद करने के लिए:
यह पर्व हमें हमारे पूर्वजों की याद दिलाता है, जिन्होंने हमें संस्कार, संस्कृति और जीवन की सीख दी।
आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए:
पितरों का आशीर्वाद जीवन में सुख-शांति, स्वास्थ्य व समृद्धि का स्रोत माना जाता है। पितृ पक्ष में तर्पण व पिंडदान करके यह आशीर्वाद प्राप्त करने का विशेष अवसर प्राप्त होता है।
कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए:
हमारे पूर्वजों ने अपने जीवन संघर्षों से हमारे लिए आधार बनाया। यह पर्व उनके प्रति कृतज्ञता व सम्मान व्यक्त करने का माध्यम है।
🌺 कैसे मनाया जाता है:
पितृ पक्ष के दौरान श्रद्धालु तीर्थस्थलों, पवित्र नदियों या अपने घर के पवित्र स्थान पर तर्पण व पिंडदान करते हैं।
विशेष पूजा विधि से पितरों के लिए तर्पण अर्पित किया जाता है।
पिंडदान अनुष्ठान द्वारा पितरों को शांति व सुख-समृद्धि की प्रार्थना की जाती है।
यह व्रत अमावस्या तक चलता है, जिसमें श्रद्धालु पूरी भक्ति भावना से अनुष्ठान संपन्न करते हैं।
📚 क्यों हर व्यक्ति को पितृ पक्ष मानना चाहिए:
यह हमारी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने का अवसर है।
पूर्वजों की याद से हम अपने जीवन के मूल्यों, संस्कारों और कर्तव्यों को याद करते हैं।
यह पर्व पारिवारिक एकता, सम्मान और सामाजिक सद्भावना को प्रबल करता है।
सही समय पर तर्पण-पिंडदान करने से आत्मिक शांति प्राप्त होती है।
📝 निष्कर्ष:
‘पितृ पक्ष’ भारतीय संस्कृति की एक अनमोल परंपरा है, जो पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, सम्मान व कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष पर्व है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि हमें अपने संस्कार, परिवार और समाज से जोड़ने वाला एक पवित्र सूत्र भी है। इसे भक्ति भाव, श्रद्धा व सही विधि से मनाना चाहिए ताकि यह परंपरा आने वाली पीढ़ियों तक संरक्षित और प्रासंगिक बनी रहे।

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