आखिर क्यों होती है कार्तिक पूर्णिमा इतनी खास, जानिए पौराणिक मान्यताएं


त्रिनेत्र टइम्स सर्वमंगला मंदिर कोरबा : कार्तिक पूर्णिमा को “त्रिपुरी पूर्णिमा” भी कहा जाता है। इस दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध किया था, जो देवताओं के लिए संकट बन चुका था।
: कार्तिक पूर्णिमा का सनातन धर्म में विशेष स्थान है। इस साल 15 नवंबर को है। इसे “त्रिपुरी पूर्णिमा” या “गंगा स्नान पूर्णिमा” भी कहा जाता है। इस दिन स्नान, दान, दीपदान और पूजा का विशेष महत्व है। कार्तिक पूर्णिमा तिथि 15 नवंबर 2024 को सुबह 06 बजकर 19 मिनट से शुरू हो रही है। इस तिथि का समापन 16 नवंबर 2024 को सुबह 02 बजकर 58 पर होगा। इस पूर्णिमा पर 30 वर्ष बाद शश राजयोग का निर्माण हो रहा है जो बेहद लाभकारी है।
भगवान शिव द्वारा त्रिपुरासुर वध
कार्तिक पूर्णिमा को “त्रिपुरी पूर्णिमा” भी कहा जाता है। इस दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध किया था, जो देवताओं के लिए संकट बन चुका था। त्रिपुरासुर के संहार के बाद देवताओं ने भगवान शिव का धन्यवाद किया और तभी से यह दिन भगवान शिव की विशेष पूजा-अर्चना का माना गया है। उसी दिन देवताओं ने शिवलोक यानि काशी में आकर दीपावली मनाई। तभी से ये परंपरा काशी में चली आ रही हैं। माना जाता है कि कार्तिक मास के इस दिन काशी में दीप दान करने से पूर्वजों को मुक्ति मिलती है। इस दिन शिवजी की पूजा करने से सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है और विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।
कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु के रूप में मत्स्य अवतार का जन्म हुआ था, जो सृष्टि के विनाश और पुनर्सृजन की कथा से जुड़ा है। भगवान विष्णु के दस अवतारों में पहला अवतार मत्स्य अवतार माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान विष्णु ने प्रलय काल में वेदों की रक्षा के लिए कार्तिक पूर्णिमा के दिन मत्स्य रूप धारण किया था। मान्यता यह भी है कि कार्तिक मास में नारायण मत्स्य रूप में जल में विराजमान रहते हैं और इस दिन मत्स्य अवतार को त्यागकर वापस बैकुंठ धाम चले जाते हैं।
सिख धर्म में महत्व
कार्तिक पूर्णिमा का सिख धर्म में भी विशेष महत्व है, क्योंकि इसी दिन गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ था। सिख धर्म में इसे “गुरु पर्व” के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर गुरुद्वारों में विशेष पूजा पाठ और लंगर का आयोजन किया जाता है। सिख समुदाय के लोग इस दिन गुरु नानक देव जी के उपदेशों का स्मरण करते हैं और उनके सिद्धांतों का पालन करने का संकल्प लेते हैं।
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ब्रह्मा जी का अवतरण
पौराणिक मान्यता के अनुसार इस दिन सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा का अवतरण पुष्कर के पवित्र सरोवर में हुआ था। इस दिन ब्रह्माजी ने अपनी रचना शक्ति का उपयोग करके जीवों, पृथ्वी और प्रकृति का सृजन किया था, जिससे सृष्टि में जीवन का संचार हुआ। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर लाखों की संख्या में तीर्थयात्री ब्रह्मा की नगरी पुष्कर आते हैं। पवित्र पुष्कर सरोवर में स्नान करने के पश्चात ब्रह्मा जी के मंदिर में पूजा-अर्चना कर दीपदान करते हैं और देवों की कृपा पाते है।

