तीन महीने में उखड़ी CSR की सड़क, अब इंजीनियरिंग जांच की बारी! 15 लाख की सड़क में ‘खेल’ किसने किया—ठेकेदार से लेकर इंजीनियर तक जांच के घेरे में
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त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**//**कोरबा। ग्राम बरपाली के बाजार मोहल्ले में मां मड़वारानी मंदिर से जेत-स्तंभ तक अडानी (लैंको अमरकंटक) के CSR मद से लगभग 15–16 लाख रुपये की लागत से बनाई गई CC सड़क महज तीन महीने में पहली ही बारिश में उखड़ने लगी है। सड़क की यह हालत अब केवल निर्माण एजेंसी पर सवाल नहीं खड़े कर रही, बल्कि गुणवत्ता जांच, तकनीकी निरीक्षण और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका को भी कटघरे में खड़ा कर रही है।
ग्रामीणों का सवाल है कि जिस सड़क के निर्माण पर लाखों रुपये खर्च किए गए, उसका निर्माण पूरा होने के बाद संबंधित तकनीकी अमले ने आखिर किस आधार पर काम को सही माना? यदि सड़क निर्माण निर्धारित मापदंडों के अनुसार हुआ था तो महज तीन महीने में उसकी परत उखड़ने और जगह-जगह गड्ढे बनने की नौबत क्यों आई?
इस मामले में सांसद प्रतिनिधि मंदीप शर्मा की ओर से कलेक्टर को पत्र सौंपकर उच्चस्तरीय एवं निष्पक्ष तकनीकी जांच की मांग की गई है। पत्र में निर्माण में लापरवाही, तकनीकी मानकों की अनदेखी और निम्न गुणवत्ता की सामग्री के उपयोग के आरोप लगाए गए हैं।
सिर्फ ठेकेदार नहीं, जांच की आंच इंजीनियरिंग सिस्टम तक भी पहुंचे

किसी भी सरकारी अथवा CSR निर्माण में केवल ठेकेदार की जिम्मेदारी नहीं होती। निर्माण की गुणवत्ता की निगरानी, तकनीकी परीक्षण, माप और कार्य की स्वीकृति जैसी प्रक्रियाओं में संबंधित तकनीकी अधिकारियों और इंजीनियरिंग अमले की भूमिका भी होती है।
इसीलिए इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है—निर्माण के दौरान इंजीनियर ने सड़क को कब-कब देखा? किस स्तर पर गुणवत्ता की जांच हुई? सामग्री की गुणवत्ता का परीक्षण हुआ या नहीं? सड़क की मोटाई और निर्धारित मानकों की जांच किसने की? और यदि काम सही पाया गया था तो तीन महीने बाद सड़क की यह हालत कैसे हो गई?
यदि जांच में निर्माण में गंभीर तकनीकी अनियमितता सामने आती है तो केवल ठेकेदार पर कार्रवाई करके मामला खत्म नहीं होना चाहिए। जिस अधिकारी या तकनीकी कर्मचारी की जिम्मेदारी निर्माण की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की थी, उसकी भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
15–16 लाख रुपये की सड़क या तीन महीने का निर्माण?
ग्रामीणों के बीच यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि लाखों रुपये खर्च होने के बाद यदि सड़क पहली बारिश में ही जवाब दे दे तो आखिर जनता के पैसे का हिसाब कौन देगा?
मामला CSR मद का है, इसलिए इसमें यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि कंपनी की ओर से उपलब्ध कराई गई राशि का उपयोग निर्धारित गुणवत्ता और उद्देश्य के अनुरूप हुआ या नहीं। यदि घटिया निर्माण की पुष्टि होती है तो आर्थिक नुकसान की वसूली जिम्मेदार पक्ष से क्यों न की जाए?
‘कागज पर मजबूत, जमीन पर कमजोर’ तो किसकी जिम्मेदारी?

सड़क की वास्तविक गुणवत्ता जानने के लिए अब केवल मौके का निरीक्षण पर्याप्त नहीं होगा। स्वतंत्र तकनीकी विशेषज्ञों से कोर कटिंग, मोटाई, सामग्री और अन्य निर्धारित तकनीकी मानकों की जांच कराई जानी चाहिए। इससे स्पष्ट हो सकता है कि सड़क वास्तव में निर्धारित मानकों के अनुसार बनी थी या निर्माण में कहीं कमी छोड़ी गई।
यदि जांच में मानकों की अनदेखी साबित होती है तो ठेकेदार/निर्माण एजेंसी के साथ-साथ गुणवत्ता नियंत्रण और पर्यवेक्षण से जुड़े जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी तय की जानी चाहिए।
ग्रामीणों की चार मांगें, प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती
प्रशासन से स्वतंत्र विशेषज्ञ टीम से निष्पक्ष जांच, दोषी ठेकेदार एवं जिम्मेदार कर्मचारियों पर कार्रवाई, नुकसान की वित्तीय वसूली तथा सड़क का पुनः मानक स्तर पर निर्माण कराने की मांग की गई है।
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि आम जनता की सुविधा के लिए बनाई गई है। इसलिए इसकी गुणवत्ता से समझौता सीधे जनहित से जुड़ा मामला है।
अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले को केवल ‘सड़क खराब मिली’ तक सीमित रखता है या फिर यह भी पता लगाता है कि सड़क खराब होने की जिम्मेदारी आखिर किसकी थी, निरीक्षण किसने किया, गुणवत्ता किसने प्रमाणित की और भुगतान किस आधार पर हुआ।
तीन महीने में सड़क उखड़ना अपने आप में जांच का पर्याप्त कारण है। अब जरूरत सड़क पर पैबंद लगाने की नहीं, बल्कि पूरे निर्माण की परत-दर-परत जांच करने की है।







