बारिश भी नहीं रोक सकी माताओं की आस्था! श्रद्धा, उपवास और परंपरा के बीच जवाली में गूंजा कमरछठ का जयकारा
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संतान की सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना लेकर माताओं ने रखा व्रत — छत्तीसगढ़ी लोकपरंपरा और पारिवारिक संस्कारों से सराबोर रहा हलषष्ठी पर्व
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**//** जवाली। छत्तीसगढ़ की मिट्टी में रची-बसी लोकपरंपराओं और पारिवारिक आस्था का पर्व हलषष्ठी, जिसे कमरछठ भी कहा जाता है, जवाली में इस वर्ष भी श्रद्धा, उल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। बारिश और खराब मौसम के बावजूद माताओं की आस्था और उत्साह में कोई कमी नहीं आई। बड़ी संख्या में महिलाओं ने एकत्र होकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की तथा अपनी संतानों के सुख, समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य, दीर्घायु और मंगलमय जीवन की कामना की।
कमरछठ केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति, कृषि परंपरा, मातृभावना और पारिवारिक मूल्यों से जुड़ा महत्वपूर्ण अवसर है। ग्रामीण अंचलों में आज भी यह पर्व सामूहिक रूप से मनाया जाता है, जिसमें महिलाएं अपनी पारंपरिक मान्यताओं और स्थानीय रीति-रिवाजों को जीवंत रखती हैं।
संतान की मंगलकामना के लिए रखा जाता है व्रत
हलषष्ठी पर्व माताओं के लिए विशेष महत्व रखता है। मान्यता के अनुसार इस दिन माताएं अपनी संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि, सुरक्षा और उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए व्रत एवं पूजा करती हैं।
इस पर्व में कृषि और प्रकृति से जुड़ी कई परंपराओं का विशेष महत्व है। यही कारण है कि पूजा में ऐसे अन्न, भाजी और सामग्री का उपयोग किया जाता है, जिनका संबंध पारंपरिक ग्रामीण जीवन और खेती-किसानी से रहा है।
क्या खास है कमरछठ की पूजा में?
कमरछठ की पूजा में पारंपरिक नियमों का विशेष ध्यान रखा जाता है। स्थानीय परंपरा के अनुसार पूजा के लिए भैंस के दूध की व्यवस्था की जाती है। इसके अलावा ऐसी भाजी और खाद्य सामग्री का उपयोग किया जाता है, जिनका संबंध बिना हल चले खेतों या पारंपरिक रूप से प्राप्त प्राकृतिक संसाधनों से माना जाता है।
पूजा में छह प्रकार की भाजी, महुआ, लाई, राहड़ दाना तथा पसहर चावल से तैयार खीर जैसी पारंपरिक सामग्रियों का उपयोग किया गया। भाजी को सेंधा नमक से तैयार कर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया गया।

इन पारंपरिक सामग्रियों का उपयोग पर्व को ग्रामीण जीवन और प्रकृति से जोड़ता है तथा पुरानी पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को आगे बढ़ाने का माध्यम बनता है।
पीठ पर लगाया जाता है सात-सात बार ठप्पा
कमरछठ की स्थानीय परंपराओं में पीठ पर सात-सात बार ठप्पा लगाने की रस्म का भी विशेष महत्व माना जाता है। माताएं पारंपरिक विधि से यह रस्म पूरी करती हैं और संतान तथा परिवार के मंगल की कामना करती हैं।
इस दौरान महिलाएं सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना करती हैं और पर्व से जुड़ी कथा का श्रवण करती हैं।
जवाली में सुबह से शुरू हुआ पूजा-अर्चना का सिलसिला
जवाली में कमरछठ पर्व के अवसर पर सुबह से ही महिलाओं में उत्साह देखने को मिला। प्रातः 10 बजे के बाद समूहवार पूजा-अर्चना का शुभारंभ किया गया। खराब मौसम और बारिश के बावजूद माताएं निर्धारित स्थानों पर पहुंचीं और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा संपन्न की।
इसी क्रम में गौतम गुड्डू रामसनेही महाराज के निवास पर उनकी माताजी के मार्गदर्शन में कमरछठ की कथा एवं सामूहिक आरती का आयोजन किया गया। बड़ी संख्या में माताओं एवं श्रद्धालुओं ने एक साथ कथा का श्रवण किया और सामूहिक आरती में शामिल होकर पर्व की धार्मिक एवं सांस्कृतिक भावना को आत्मसात किया।
बारिश के बीच भी नहीं टूटा माताओं का उत्साह
पर्व के दिन मौसम खराब रहा और बारिश का दौर भी जारी रहा, लेकिन माताओं की श्रद्धा के सामने मौसम की प्रतिकूलता भी छोटी पड़ गई। महिलाएं पूरे उत्साह के साथ पूजा में शामिल हुईं।
सामूहिक पूजा के दौरान एक ओर जहां धार्मिक आस्था का वातावरण रहा, वहीं दूसरी ओर महिलाओं के बीच आपसी मेलजोल, सामाजिक एकता और पारिवारिक भावनाओं का सुंदर संगम भी देखने को मिला।
छत्तीसगढ़ की संस्कृति को जीवंत रखने वाला पर्व
कमरछठ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पर्व धार्मिक आस्था के साथ-साथ छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति और पारंपरिक जीवनशैली को भी अपने भीतर समेटे हुए है।
पूजा में उपयोग होने वाली पारंपरिक सामग्री, सामूहिक रूप से कथा सुनना, आरती करना, स्थानीय रीति-रिवाजों का पालन और माताओं का एक साथ जुटना—ये सभी परंपराएं नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ती हैं।
आज जब आधुनिक जीवनशैली के कारण कई पारंपरिक रीति-रिवाज धीरे-धीरे सीमित होते जा रहे हैं, ऐसे पर्व ग्रामीण और सामाजिक जीवन में संस्कृति को जीवित रखने का महत्वपूर्ण माध्यम बने हुए हैं।
मध्यनारी, मौहारपारा और ठाकुरपारा में भी रही धूम
जवाली के साथ-साथ मध्यनारी, मौहारपारा और ठाकुरपारा में भी हलषष्ठी/कमरछठ पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। विभिन्न स्थानों पर महिलाओं ने सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना कर संतान के सुख-स्वास्थ्य और दीर्घायु की मंगलकामना की।
आयोजन के दौरान तीजबाई, बबली, सरस्वती, उमा, रजनी, दिलबाई, शीला, सिकन, दरहीन सहित अनेक महिलाओं की सहभागिता रही।
नई पीढ़ी तक पहुंचे छत्तीसगढ़ी संस्कार
कमरछठ पर्व का संदेश केवल पूजा और व्रत तक सीमित नहीं है। यह पर्व बताता है कि परंपराएं तभी जीवित रहती हैं, जब उन्हें अगली पीढ़ी तक पहुंचाया जाए।
बुजुर्ग महिलाओं के मार्गदर्शन में नई पीढ़ी की महिलाओं और बच्चों का पर्व से जुड़ना छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत के लिए सकारात्मक संकेत है। सामूहिक आयोजन सामाजिक एकता को मजबूत करने के साथ-साथ परिवार और समाज में संस्कारों की भावना को भी बढ़ावा देते हैं।
आस्था ने दिया संदेश—परंपरा रहे जीवित, संस्कृति पीढ़ियों तक पहुंचे
जवाली में बारिश और खराब मौसम के बीच भी जिस उत्साह के साथ कमरछठ पर्व मनाया गया, उसने एक बार फिर साबित किया कि छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति आज भी गांवों की मिट्टी में पूरी मजबूती से जीवित है।
माताओं ने संतान के मंगल की कामना के साथ व्रत, पूजा, कथा और आरती में भाग लेकर न केवल धार्मिक आस्था निभाई, बल्कि अपनी लोकपरंपरा और सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का संदेश भी दिया।
कमरछठ की यह सामूहिक आस्था यही संदेश देती नजर आई—मौसम चाहे जैसा हो, समय कितना भी बदल जाए, लेकिन छत्तीसगढ़ की परंपरा, मातृभावना और संस्कृति की जड़ें हमेशा मजबूत रहेंगी।







