झारखंड का सत्याग्रह और विपक्ष की चुप्पी: क्या आंदोलन भी अब राजनीतिक सुविधा के अनुसार तय होते हैं?
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जंतर-मंतर पर सक्रिय दिखने वाले कई बड़े नेता झारखंड के आंदोलन से दूर, उठ रहे हैं सवाल
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**//** रांची/नई दिल्ली झारखंड में अपनी मांगों को लेकर सत्याग्रह और भूख हड़ताल पर बैठे युवाओं का आंदोलन जारी है। आंदोलनकारियों का दावा है कि वे भारी बारिश के बीच तिरपाल के सहारे धरना दे रहे हैं और उन्हें टेंट लगाने की अनुमति भी नहीं मिली। इन परिस्थितियों के बीच अब विपक्षी दलों की भूमिका को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर विभिन्न आंदोलनों में सक्रिय रूप से पहुंचने वाले कई प्रमुख विपक्षी नेताओं—राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, अरविंद केजरीवाल सहित अन्य नेताओं—की ओर से अब तक इस आंदोलन को लेकर व्यापक सार्वजनिक उपस्थिति नहीं दिखी है। इससे सवाल उठ रहे हैं कि क्या सभी आंदोलनों को समान राजनीतिक समर्थन मिलता है, या समर्थन मुद्दे और राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार बदल जाता है?

आंदोलनकारी मांग कर रहे हैं कि उनकी समस्याओं पर सरकार तत्काल संवाद करे और आंदोलन स्थल पर न्यूनतम सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। दूसरी ओर, प्रशासन का पक्ष भी महत्वपूर्ण है और उसे भी सामने आना चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लोकतंत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी है कि वे जनसरोकार के मुद्दों पर अपनी स्पष्ट प्रतिक्रिया दें। ऐसे में झारखंड का यह आंदोलन भी स्वाभाविक रूप से राजनीतिक और सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गया है।


