आषाढ़ में लापरवाही पड़ सकती है भारी: सही खान-पान और दिनचर्या अपनाकर रहें निरोग, आयुर्वेदाचार्य डॉ. नागेंद्र शर्मा ने दी महत्वपूर्ण सलाह



मौसम परिवर्तन के दौर में उबला पानी पीने, जामुन खाने, योग-व्यायाम करने और तले-भुने भोजन से दूरी बनाने की अपील
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**//**कोरबा। वर्षा ऋतु की शुरुआत के साथ ही मौसम में तेजी से बदलाव आता है, जिससे संक्रमण और पाचन संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे समय में यदि खान-पान और दिनचर्या पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाए तो छोटी-सी लापरवाही भी स्वास्थ्य पर भारी पड़ सकती है। इसी को ध्यान में रखते हुए छत्तीसगढ़ के ख्यातिलब्ध आयुर्वेद चिकित्सक एवं नाड़ी वैद्य डॉ. नागेंद्र नारायण शर्मा ने आषाढ़ मास में स्वस्थ रहने के लिए आयुर्वेद आधारित महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं।
डॉ. शर्मा ने बताया कि 30 जून से 29 जुलाई 2026 तक चलने वाला आषाढ़ मास ऋतु परिवर्तन का संधिकाल माना जाता है। इस अवधि में गर्मी समाप्त होकर वर्षा ऋतु का आगमन होता है, जिससे शरीर की पाचन शक्ति कमजोर पड़ जाती है। ऐसे समय में संतुलित आहार, नियमित दिनचर्या और आयुर्वेद के सिद्धांतों का पालन करने से अनेक मौसमी बीमारियों से बचा जा सकता है।
उन्होंने कहा कि वर्षा ऋतु के आरंभ में जलजनित संक्रमण तेजी से फैलते हैं, इसलिए इस दौरान उबालकर या स्वच्छ पानी पीना सबसे सुरक्षित उपाय है। भोजन हमेशा ताजा, हल्का और सुपाच्य होना चाहिए। अत्यधिक भोजन, मसालेदार, तला-भुना और बासी भोजन पाचन तंत्र पर अतिरिक्त दबाव डालता है, जिससे गैस, अपच और पेट संबंधी समस्याएं बढ़ सकती हैं।
डॉ. नागेंद्र शर्मा ने बताया कि आषाढ़ मास में आम और जामुन जैसे रसीले फलों का सेवन शरीर के लिए लाभकारी होता है। वहीं सौंफ और हींग का उपयोग पाचन शक्ति को मजबूत बनाता है। इसके विपरीत बेल का सेवन इस माह में नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे पाचन और आंतों से जुड़ी समस्याएं उत्पन्न होने की आशंका बढ़ सकती है।
उन्होंने यह भी बताया कि आयुर्वेद और धार्मिक ग्रंथों में आषाढ़ मास में संयमित भोजन का विशेष महत्व बताया गया है। यदि संभव हो तो एक समय भोजन (एकभुक्त) करने की परंपरा स्वास्थ्य के लिए लाभदायक मानी गई है। साथ ही भोजन में जीरा, सूखा धनिया, हल्दी, काली मिर्च, मेथी, दालचीनी, पुदीना और हरा धनिया जैसे मसालों का संतुलित उपयोग शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक होता है।
डॉ. शर्मा ने कहा कि इस मौसम में केवल खान-पान ही नहीं, बल्कि जीवनशैली भी स्वस्थ रहना बेहद जरूरी है। प्रतिदिन प्रातः जल्दी उठना, नियमित योग, प्राणायाम, ध्यान, खेल-कूद और शारीरिक श्रम करने से शरीर सक्रिय रहता है तथा रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है। वहीं दिन में अधिक देर तक सोना, देर रात तक जागना, आलस्यपूर्ण जीवनशैली अपनाना और तामसिक भोजन करना स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
उन्होंने लोगों से अपील की कि आषाढ़ मास में संतुलित एवं पौष्टिक भोजन, पर्याप्त जल सेवन, नियमित व्यायाम और स्वच्छता को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं। आयुर्वेद के इन सरल नियमों का पालन कर व्यक्ति वर्षा ऋतु में होने वाले अधिकांश संक्रमणों और मौसमी बीमारियों से बचते हुए स्वस्थ एवं निरोग जीवन जी सकता है।


