March 13, 2026

त्रिनेत्र टाईम्स

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पापमोचिनी एकादशी 15 मार्च को: व्रत, पूजा और कथा श्रवण से पापों का होता है नाश

 

 

चैत्र कृष्ण पक्ष की पावन एकादशी का विशेष महत्व, श्रद्धालु करेंगे भगवान श्रीकृष्ण और विष्णु की उपासना
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ****//** कोरबा। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली पापमोचिनी एकादशी इस वर्ष 15 मार्च 2026 रविवार को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह एकादशी पापों के नाश और आध्यात्मिक शुद्धि के लिए अत्यंत पुण्यदायी मानी जाती है। इस दिन भगवान विष्णु की आराधना, व्रत, कथा श्रवण और दान-पुण्य करने से मनुष्य के अनेक पाप नष्ट होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।
ज्योतिष एवं धर्माचार्यों के अनुसार एकादशी तिथि का प्रारंभ 14 मार्च 2026 शनिवार को प्रातः 08 बजकर 10 मिनट से होगा, जबकि तिथि का समापन 15 मार्च 2026 रविवार को प्रातः 09 बजकर 16 मिनट पर होगा। उदयातिथि के अनुसार पापमोचिनी एकादशी का व्रत 15 मार्च रविवार को रखा जाएगा। व्रत का पारण 16 मार्च 2026 सोमवार को प्रातः 06 बजकर 30 मिनट से 08 बजकर 54 मिनट के मध्य किया जाएगा।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार एक बार अर्जुन ने भगवान भगवान श्रीकृष्ण से चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी के महत्व के बारे में प्रश्न किया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि इस एकादशी को पापमोचिनी एकादशी कहा जाता है और इसके व्रत से मनुष्य के अनेक पापों का नाश होता है। यह कथा पहले पृथ्वीपति राजा मान्धाता ने महर्षि लोमश से सुनी थी, जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया।
पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में चैत्ररथ नामक वन में मेधावी नाम के एक ऋषि तपस्या करते थे। उसी वन में मञ्जुघोषा नाम की अप्सरा आई और अपने मधुर संगीत तथा सौंदर्य से उन्हें मोहित कर लिया। कामदेव के प्रभाव में आकर ऋषि मेधावी अपनी तपस्या भूल गए और लंबे समय तक उस अप्सरा के साथ रहे। जब उन्हें यह ज्ञात हुआ कि इस मोह में उनके जीवन के 57 वर्ष बीत चुके हैं, तो उन्हें अत्यंत पश्चाताप हुआ और क्रोध में आकर उन्होंने अप्सरा को पिशाचिनी बनने का श्राप दे दिया।
श्राप से दुखी मञ्जुघोषा ने ऋषि से क्षमा मांगी और मुक्ति का उपाय पूछा। तब ऋषि मेधावी ने बताया कि चैत्र कृष्ण पक्ष की पापमोचिनी एकादशी का व्रत करने से उसे श्राप से मुक्ति मिल जाएगी। अप्सरा ने विधिपूर्वक यह व्रत किया और उसके प्रभाव से वह पिशाचिनी योनि से मुक्त होकर पुनः अपने दिव्य स्वरूप में स्वर्गलोक को प्राप्त हुई। बाद में ऋषि मेधावी ने भी अपने पिता च्यवन ऋषि के निर्देश पर यह व्रत किया और अपने पापों से मुक्त होकर पुनः तेजस्वी हो गए।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पापमोचिनी एकादशी का व्रत करने और इसकी कथा सुनने से मनुष्य के बड़े से बड़े पाप भी नष्ट हो जाते हैं। कहा जाता है कि इस व्रत का पुण्य हजार गौदान के समान फल प्रदान करता है। ब्रह्म हत्या, स्वर्ण चोरी, मद्यपान और अन्य गंभीर पापों से मुक्ति पाने के लिए भी यह एकादशी अत्यंत प्रभावी मानी जाती है।
नाड़ीवैद्य पंडित डॉ. नागेन्द्र नारायण शर्मा ने बताया कि इस दिन श्रद्धालुओं को प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करनी चाहिए, व्रत रखना चाहिए तथा एकादशी कथा का श्रवण करना चाहिए। साथ ही जरूरतमंदों को दान-पुण्य करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है। उन्होंने कहा कि पापमोचिनी एकादशी का व्रत मनुष्य के जीवन में आध्यात्मिक शुद्धि, मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।

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