बेटी की विदाई घर की देहरी से ही हो— परंपरा बचाइए, सौभाग्य संजोइए






त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ****/** कोरबा आज के आधुनिक और भव्य विवाह आयोजनों के दौर में एक महत्वपूर्ण सामाजिक–सांस्कृतिक संदेश सामने आ रहा है— बेटी की शादी कहीं भी हो, लेकिन विदाई अपने घर की देहरी से ही होनी चाहिए। गार्डन, होटल या महंगे रिज़ॉर्ट में विवाह समारोह करना आधुनिकता का प्रतीक हो सकता है, परंतु बेटी की विदाई की पवित्र परंपरा मायके की देहरी से जुड़ी होती है, जिसे भूलना हमारी सांस्कृतिक जड़ों से दूर होना है।
परंपरा के अनुसार, जब बेटी विवाह के बाद मायके से विदा होती है, तो वह देहरी लांघते समय बिना पीछे मुड़े अपने पीछे चावल और सिक्के उछालती है। इसका गूढ़ अर्थ यह है कि लक्ष्मी स्वरूपा बेटी अपने मायके का सौभाग्य अपने साथ न ले जाए, बल्कि मायके में सदा अन्न-धन, सुख-समृद्धि और खुशहाली बनी रहे। यह केवल रस्म नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक आध्यात्मिक मान्यता और भावनात्मक आस्था है।
आजकल यह परंपरा घर की बजाय होटल, रिज़ॉर्ट और मैरिज गार्डन में निभाई जा रही है। जानकारों का मानना है कि परंपरा के स्थान बदलने से भाव और संस्कार कमजोर पड़ते हैं। प्रतीकात्मक रूप से ही सही, सौभाग्य और शुभता घर की देहरी से जुड़ी मानी जाती है— और जब विदाई घर से नहीं होती, तो घर से जुड़ी उस पवित्र भावना का भी क्षय होता है।
सामाजिक विचारकों का कहना है कि आधुनिकता अपनाइए, पर अपनी परंपराओं की जड़ों को न काटिए। भव्य आयोजन, फैंसी सजावट और आधुनिक व्यवस्थाएं समय की मांग हैं, लेकिन संस्कारों को बचाए रखना हमारी जिम्मेदारी है। परंपराएं हमें हमारी पहचान देती हैं और पीढ़ियों को संस्कारों की विरासत सौंपती हैं।
इस संदेश के माध्यम से परिवारों से अपील की गई है कि वे शौक, रुतबा और आवरण भले बदलें— पर संस्कृति नहीं। अभी समय है कि हम अपनी परंपराओं की ओर लौटें, बेटी की विदाई को फिर से मायके की देहरी से जोड़ें, ताकि संस्कार भी जीवित रहें और भावनात्मक जुड़ाव भी मजबूत बना रहे।





