षटतिला एकादशी व्रत से दूर होते हैं दरिद्रता और दुर्भाग्य, मिलता है वैकुण्ठ लोक का पुण्य 14 जनवरी को मनाई जाएगी माघ कृष्ण षटतिला एकादशी, जानिए व्रत की तिथि, पारण समय और पौराणिक महत्व






त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा *****//** कोरबा* माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को षटतिला एकादशी कहा जाता है। यह व्रत भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित होता है और विशेष रूप से तिल के दान, स्नान, हवन एवं भोजन का विधान इस दिन बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत के प्रभाव से दरिद्रता, दुर्भाग्य, कष्ट और पापों का नाश होता है तथा अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।
षटतिला एकादशी तिथि एवं पारण का समय
एकादशी तिथि प्रारंभ — 13 जनवरी 2026, मंगलवार को दोपहर 03:17 बजे
एकादशी तिथि समाप्त — 14 जनवरी 2026, बुधवार को सायं 05:52 बजे
षटतिला एकादशी व्रत — 14 जनवरी 2026, बुधवार
व्रत पारण का समय — 15 जनवरी 2026, गुरुवार को प्रातः 07:15 बजे से 09:21 बजे तक
षटतिला एकादशी व्रत कथा का पौराणिक महत्व
पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीनकाल में मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी निवास करती थी, जो नियमित रूप से व्रत करती थी। उसने एक बार पूरे एक माह तक कठोर व्रत किया, जिससे उसका शरीर दुर्बल हो गया। यद्यपि वह अत्यंत धर्मपरायण थी, किंतु उसने कभी देवताओं या ब्राह्मणों को अन्न अथवा धन का दान नहीं किया था।
भगवान विष्णु ने इस स्थिति को देखकर भिक्षुक का वेश धारण किया और उससे भिक्षा माँगी। ब्राह्मणी ने अन्न के स्थान पर भिक्षापात्र में मिट्टी का ढेला डाल दिया। कालांतर में जब उस ब्राह्मणी ने शरीर त्याग किया, तो उसे स्वर्ग में एक सुंदर महल प्राप्त हुआ, किंतु वह महल अन्न एवं सभी भोग सामग्रियों से रिक्त था।
अपनी व्यथा लेकर वह भगवान विष्णु के पास पहुँची। भगवान ने उसे षटतिला एकादशी का माहात्म्य सुनने एवं व्रत करने का निर्देश दिया। देवस्त्रियों से व्रत का महत्व जानकर ब्राह्मणी ने श्रद्धापूर्वक षटतिला एकादशी का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से वह सुंदर, तेजस्वी और समृद्ध हो गई तथा उसका महल अन्न-धन से परिपूर्ण हो गया।
दान और व्रत से मिलता है पूर्ण फल
धार्मिक शास्त्रों में बताया गया है कि षटतिला एकादशी पर तिल का दान, तिल से स्नान, तिल का हवन, तिल से बना भोजन एवं तिल का उपयोग करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। यह व्रत मनुष्य के जीवन से दरिद्रता, रोग, संकट और दुर्भाग्य को दूर करता है तथा विष्णु लोक की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
धर्माचार्यों का कहना है कि इस एकादशी पर केवल उपवास ही नहीं, बल्कि दान की भावना अत्यंत आवश्यक है, तभी व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
नाड़ीवैद्य पंडित डॉ. नागेंद्र नारायण शर्मा





