18 सीसी सड़कों पर सवालों का ‘कंक्रीट’ वार! विधायक मद के कामों में कम मोटाई की शिकायत, अब कोर कटिंग से खुलेगा गुणवत्ता का सच
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त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**//** कोरबा। जनपद पंचायत कोरबा की विभिन्न ग्राम पंचायतों में विधायक मद, विकास निधि, खनिज न्यास सहित अन्य मदों से कराए गए सीसी रोड निर्माण कार्य अब सवालों के घेरे में हैं। भारतीय जनता पार्टी अनुसूचित जनजाति मोर्चा के जिलाध्यक्ष कुल सिंह कंवर ने कलेक्टर कोरबा को शिकायत सौंपकर 18 अलग-अलग सीसी रोड कार्यों में निर्धारित मोटाई, गुणवत्ता और निर्माण की वास्तविक स्थिति की जांच कराने की मांग की है। शिकायत में आरोप है कि स्वीकृत मापदंड के अनुरूप सड़क की मोटाई धरातल पर नहीं रखे जाने की आशंका है। मामला सही है या नहीं, इसका फैसला अब कागजों से नहीं बल्कि तकनीकी जांच और कोर कटिंग से करने की मांग उठी है।
शिकायत की सबसे गंभीर बात यह है कि यदि प्राक्कलन में निर्धारित मोटाई से कम कंक्रीट डाला गया है और इसके बावजूद माप पुस्तिका में पूरा कार्य दर्ज कर भुगतान किया गया है, तो सवाल केवल निर्माण एजेंसी पर नहीं बल्कि तकनीकी परीक्षण, साइट निरीक्षण, माप पुस्तिका, गुणवत्ता नियंत्रण और भुगतान की पूरी प्रक्रिया पर खड़ा होगा।
मोटाई कितनी होनी चाहिए? पहले खुले स्वीकृत प्राक्कलन का पन्ना
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज प्रत्येक सड़क का तकनीकी स्वीकृति आदेश, स्वीकृत प्राक्कलन, ड्राइंग-डिजाइन, एसओआर और कार्यादेश हैं। इन्हीं में तय होगा कि संबंधित सड़क के लिए कंक्रीट की निर्धारित मोटाई कितनी थी। इसलिए जांच का पहला सवाल यही होना चाहिए कि 18ों कार्यों में स्वीकृत मोटाई कितनी-कितनी थी और मौके पर वास्तविक मोटाई कितनी निकली?

यदि किसी कार्य के प्राक्कलन में, उदाहरण के लिए, 150 एमएम या अन्य निर्धारित मोटाई स्वीकृत है और कोर कटिंग में उससे कम मोटाई सामने आती है, तो यह सामान्य तकनीकी अंतर नहीं माना जा सकता। ऐसी स्थिति में विभाग को यह भी देखना होगा कि कमी कितनी है, क्या वह स्वीकार्य तकनीकी सीमा के भीतर है और क्या भुगतान उसी वास्तविक मात्रा के आधार पर किया गया है।
अब सड़क खोदकर नहीं, वैज्ञानिक तरीके से होगी असली परीक्षा
शिकायतकर्ता ने कलेक्टर से मांग की है कि संबंधित कार्यों में स्वतंत्र तकनीकी टीम की मौजूदगी में कोर कटिंग कराई जाए। कोर कटिंग से सड़क की वास्तविक मोटाई की जांच की जा सकती है। इसके साथ कंक्रीट की गुणवत्ता, आवश्यक होने पर सामग्री एवं मजबूती से जुड़े परीक्षण भी कराए जाने चाहिए।
जांच केवल एक स्थान से कोर निकालकर पूरी सड़क को क्लीन चिट देने वाली नहीं होनी चाहिए। प्रत्येक संदिग्ध सड़क पर पर्याप्त और प्रतिनिधि स्थानों से नमूने लेकर परीक्षण कराया जाना चाहिए, ताकि पूरी स्थिति सामने आ सके।
18 सड़कें, एक सवाल—किसने बनाया और किसने जांचा?
शिकायत में जिन 18 कार्यों का उल्लेख किया गया है, उनमें देवरमाल, अखरापाली, कुदुरमाल, करूमौहा, कटबितला, दोंगदरहा, बुंदेली, बरीडीह, बगबुड़ा, बेंदरकोना, कुरुडीह और पहंदा सहित विभिन्न स्थानों के सीसी रोड कार्य शामिल हैं।
इनमें देवरमाल में नहर पुल से बस्ती की ओर तथा धरमेन्द्र घर से लखन पटेल घर की ओर, अखरापाली के सतनामी पारा, कुदुरमाल में नहर रोड से सरपंच घर की ओर, करूमौहा में आंछिमार से चाकामार, कटबितला बस्ती, दोंगदरहा के टिकरापारा और मुस्कान घर से वोटवारी की ओर, बुंदेली में गार्डन बाड़ी से महावीर मंझवार घर तक, बरीडीह में मोहनपुर तथा मुख्य मार्ग से विष्णु यादव घर की ओर, बगबुड़ा में मुख्य मार्ग से रामायण घर की ओर, बेंदरकोना के दो कार्य, कुरुडीह के विभिन्न कार्य तथा पहंदा के आश्रित ग्राम सराईडीह का कार्य शामिल है।
सिर्फ ठेकेदार नहीं—जिम्मेदारी की पूरी कड़ी जांच के घेरे में क्यों नहीं?
यदि तकनीकी जांच में शिकायत सही पाई जाती है तो जिम्मेदारी केवल निर्माण करने वाले व्यक्ति अथवा एजेंसी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जांच में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि—
कार्य का प्राक्कलन किसने तैयार किया?
तकनीकी स्वीकृति किस अधिकारी ने दी?
प्रशासकीय स्वीकृति किस स्तर से हुई?
कार्यादेश किसने जारी किया?
निर्माण स्थल का निरीक्षण किस तकनीकी अधिकारी/कर्मचारी ने किया?
माप पुस्तिका किसने तैयार की और किसने सत्यापित की?
गुणवत्ता परीक्षण किसके द्वारा कराया गया?
कार्य पूर्णता प्रमाणपत्र किसने जारी किया?
भुगतान से पहले किस अधिकारी ने कार्य की मात्रा और गुणवत्ता प्रमाणित की?
अगर सड़क वास्तव में स्वीकृत मापदंड से कम पाई जाती है, लेकिन रिकॉर्ड में पूरा माप और संतोषजनक गुणवत्ता दर्ज है, तो यह गंभीर प्रशासनिक और वित्तीय सवाल बन जाता है।
‘मिलीभगत’ का सवाल भी जांच से हो साफ—सिर्फ आरोप से नहीं
मामले में मिलीभगत हुई या नहीं, यह अभी जांच का विषय है। लेकिन यदि एक ही प्रक्रिया में कम गुणवत्ता का निर्माण, गलत माप, गुणवत्ता प्रमाणन और पूरा भुगतान जैसी बातें एक साथ सामने आती हैं तो संबंधित सभी स्तरों की भूमिका की जांच आवश्यक होगी।
इसलिए जांच केवल मौके पर जाकर सड़क देखने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। एमबी (Measurement Book), तकनीकी स्वीकृति, प्रशासकीय स्वीकृति, कार्यादेश, भुगतान विवरण, बिल-वाउचर, गुणवत्ता परीक्षण रिपोर्ट और पूर्णता प्रमाणपत्र तक की जांच होनी चाहिए। इससे साफ होगा कि गलती निर्माण के स्तर पर हुई, निगरानी में हुई या माप एवं भुगतान के स्तर पर।
कलेक्टर के सामने अब बड़ी चुनौती—जांच ऐसी हो कि सवाल ही खत्म हो जाएं
कुल सिंह कंवर ने मांग की है कि सभी 18 कार्यों की निष्पक्ष तकनीकी जांच कराई जाए और शिकायतकर्ता की मौजूदगी में कोर कटिंग कर वास्तविक मोटाई सामने लाई जाए। यदि जांच में निर्माण मानकों में कमी पाई जाती है तो संबंधित एजेंसी से आवश्यक वसूली, सुधारात्मक कार्रवाई तथा जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका निर्धारित कर नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
मामला सरकारी धन से बनी सड़कों का है। इसलिए सवाल किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ आरोप लगाने का नहीं, बल्कि जनता के पैसे से बनी सड़क वास्तव में स्वीकृत गुणवत्ता की बनी या कागजों में ही बेहतर दिखाई गई—यह पता लगाने का है।
अब निगाह कलेक्टर की जांच पर है। यदि सड़कें मानक के अनुरूप हैं तो कोर कटिंग जांच शिकायत पर विराम लगा देगी; और यदि मोटाई व गुणवत्ता में गड़बड़ी निकलती है तो 18 कार्यों की फाइलें खोलकर जिम्मेदारी तय करने से कोई स्तर बचना नहीं चाहिए।







