किताब खरीदने की आजादी या एक ही दुकान की मजबूरी? निजी स्कूलों की फीस-व्यवस्था पर अभिभावकों का आक्रोश, त्रिलोकी पब्लिक स्कूल से उठे सवालों ने खोल दी बड़ी बहस
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त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**//** कोरबा/कटघोरा। बच्चों की शिक्षा अभिभावकों के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता है, लेकिन जब इसी शिक्षा के नाम पर फीस, किताब और यूनिफॉर्म की खरीद व्यवस्था को लेकर सवाल उठने लगें तो जवाब मांगना भी जरूरी हो जाता है। कटघोरा के त्रिलोकी पब्लिक स्कूल से जुड़े एक अभिभावक की शिकायत ने अब केवल एक स्कूल नहीं, बल्कि निजी स्कूलों में किताब, फीस और यूनिफॉर्म की खरीद व्यवस्था को लेकर व्यापक सवाल खड़े कर दिए हैं।
कटघोरा निवासी प्रवीण अग्रवाल ने स्कूल प्रबंधन पर आरोप लगाते हुए किताबों की कीमत, निर्धारित स्थान से यूनिफॉर्म खरीदने और फीस वापसी जैसे मुद्दे उठाए हैं। इन आरोपों पर स्कूल प्रबंधन ने अपना पक्ष रखते हुए उन्हें बेबुनियाद बताया है। ऐसे में अब सवाल यह है कि आखिर निजी स्कूलों में अभिभावकों को किताबें और अन्य सामग्री खरीदने के लिए कितनी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए?
सबसे बड़ा सवाल—किताब एक ही दुकान से क्यों?
अभिभावकों के बीच अक्सर यह सवाल उठता है कि यदि बाजार में कई दुकानों पर किताबें उपलब्ध हैं, तो स्कूल द्वारा किसी एक विशेष दुकान या विक्रेता से ही किताबें खरीदने की व्यवस्था क्यों बनाई जाए?
किताब वही हो सकती है, कीमत वही क्यों हो—यह तय कौन करेगा?
यदि किसी पुस्तक की सूची स्कूल द्वारा निर्धारित है, तो अभिभावक को उसी पुस्तक को किसी भी अधिकृत या उपलब्ध बाजार स्रोत से खरीदने का विकल्प होना चाहिए या नहीं—यह सवाल पारदर्शिता के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है।
अभिभावकों का कहना है कि जब उन्हें एक ही दुकान की ओर भेजा जाता है, तो उनके पास अलग-अलग दुकानों पर कीमत की तुलना करने का विकल्प सीमित हो जाता है। ऐसे में किताब की वास्तविक कीमत, छपाई मूल्य, संस्करण, प्रकाशक और बाजार मूल्य की पारदर्शिता जांचना जरूरी हो जाता है।
सरकार के नियम हैं तो पालन कौन कराएगा?
निजी स्कूलों की फीस और अन्य शुल्क को लेकर सरकार तथा शिक्षा विभाग की ओर से समय-समय पर दिशा-निर्देश जारी किए जाते हैं। ऐसे में बड़ा सवाल है कि इन नियमों का पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी है?
अभिभावकों का तर्क सीधा है—
स्कूल शिक्षा दे, किताबों की सूची बताए; लेकिन किताब कहां से खरीदनी है, इसका विकल्प अभिभावकों के पास क्यों नहीं होना चाहिए?
यदि किसी स्कूल की व्यवस्था में किताब, यूनिफॉर्म या अन्य सामग्री की खरीद के लिए विशेष विक्रेता निर्धारित है, तो उसकी प्रक्रिया और आवश्यकता पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए। किसी भी व्यवस्था में अभिभावकों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ नहीं पड़ना चाहिए।
किताब के साथ यूनिफॉर्म भी सवालों के घेरे में
प्रवीण अग्रवाल ने यूनिफॉर्म को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि यूनिफॉर्म केवल एक चुनिंदा स्थान से उपलब्ध कराई जाती है।
यही सवाल किताबों की खरीद व्यवस्था से भी जुड़ जाता है—क्या अभिभावक के पास विकल्प है या फिर स्कूल की ओर से तय व्यवस्था ही अंतिम विकल्प बन जाती है?
यदि स्कूल की यूनिफॉर्म का डिजाइन या गुणवत्ता निर्धारित है तो अभिभावक को उसी निर्धारित मानक के अनुसार यूनिफॉर्म बनवाने अथवा खरीदने की सुविधा दी जा सकती है। लेकिन खरीदारी की व्यवस्था कितनी पारदर्शी है, इसकी जानकारी अभिभावकों को मिलना जरूरी है।
फीस वापसी पर भी उठे सवाल
प्रवीण अग्रवाल ने अपने बच्चे की फीस वापसी को लेकर भी स्कूल प्रबंधन पर आरोप लगाया है। उनका कहना है कि फीस वापसी के लिए स्कूल प्रबंधन से संपर्क करने के बावजूद तत्काल समाधान नहीं हुआ और बाद में उन्होंने जिला शिक्षा अधिकारी से शिकायत की।
शिकायत के बाद फीस वापस किए जाने की बात सामने आई है।
अब सवाल यह है कि फीस वापसी की स्पष्ट नीति क्या है? अभिभावकों को इसकी जानकारी पहले से दी जाती है या नहीं? आवेदन के बाद कितने समय में प्रक्रिया पूरी होनी चाहिए?
इन सवालों का जवाब स्कूल प्रबंधन और शिक्षा विभाग के दस्तावेजों से ही स्पष्ट हो सकता है।
एक स्कूल नहीं—पूरे निजी शिक्षा तंत्र के लिए बड़ा सवाल
यह विवाद केवल त्रिलोकी पब्लिक स्कूल तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। यदि किसी निजी स्कूल में किताबें, यूनिफॉर्म, फीस या अन्य शुल्क को लेकर अभिभावकों को परेशानी होती है तो शिक्षा विभाग को जिले के सभी निजी स्कूलों की व्यवस्थाओं की समीक्षा करनी चाहिए।
कौन-सा स्कूल किताबों की सूची जारी करता है?
किताबों की कीमत क्या है?
क्या अभिभावक अपनी सुविधा से दूसरी दुकान से वही किताब खरीद सकता है?
क्या किसी विशेष दुकान से खरीदने का दबाव है?
यूनिफॉर्म के लिए कितने विकल्प हैं?
फीस और फीस वापसी की नीति क्या है?
इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए।
स्कूल प्रबंधन का पक्ष—आरोप बेबुनियाद
त्रिलोकी पब्लिक स्कूल प्रबंधन ने आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए कहा है कि स्कूल में समाज के हर वर्ग के बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। गरीब एवं जरूरतमंद परिवारों के बच्चों के साथ सरकारी अधिकारियों के बच्चे भी यहां अध्ययनरत हैं।
प्रबंधन का कहना है कि स्कूल का उद्देश्य बच्चों को बेहतर शिक्षा और संस्कार देना है तथा किसी भी विद्यार्थी या अभिभावक का शोषण नहीं किया जाता। किसी अभिभावक को समस्या होने पर सीधे स्कूल प्रबंधन से संपर्क करने की बात भी कही गई है।
अब शिक्षा विभाग को दिखानी होगी सख्ती
मामले में आरोप और प्रत्यारोप दोनों सामने आ चुके हैं। अब गेंद शिक्षा विभाग के पाले में है। केवल शिकायत लेकर उसे फाइल में दबा देना पर्याप्त नहीं होगा। किताबों की सूची, बिल, निर्धारित विक्रेता की व्यवस्था, यूनिफॉर्म की बिक्री, फीस रसीद और फीस वापसी से जुड़े दस्तावेजों की जांच होनी चाहिए।
यदि व्यवस्था नियमों के अनुरूप है तो स्कूल प्रबंधन को क्लीन चिट मिलनी चाहिए और यदि कहीं नियमों का उल्लंघन सामने आता है तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
अभिभावकों का सवाल साफ है—बच्चे की शिक्षा जरूरी है, लेकिन पारदर्शिता उससे भी जरूरी है।
किताब कौन-सी होगी, यह स्कूल तय करे; लेकिन किताब कहां से खरीदनी है और किस कीमत पर खरीदनी है, इस व्यवस्था में अभिभावकों के अधिकार, विकल्प और पारदर्शिता स्पष्ट होनी चाहिए।
अब सवाल सिर्फ “किताब एक ही दुकान से क्यों?” का नहीं है, बल्कि सवाल यह है कि निजी स्कूलों की फीस, किताब और यूनिफॉर्म व्यवस्था पर सरकारी निगरानी कितनी प्रभावी है?
इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के बाद ही तस्वीर साफ होगी। तब तक आरोपों को आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए और स्कूल प्रबंधन का पक्ष भी समान रूप से महत्वपूर्ण है।







