श्रावण में बदलें खान-पान और दिनचर्या, तभी मिलेगा आरोग्य का वरदान: आयुर्वेदाचार्य डॉ. नागेंद्र नारायण शर्मा
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सावन में सात्विक भोजन, हरीतकी का सेवन और संतुलित जीवनशैली अपनाने की सलाह, पत्तेदार साग, बैंगन, मशरूम व भारी भोजन से परहेज करने का दिया संदेश
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**//** कोरबा। भगवान शिव की आराधना और आध्यात्मिक साधना का पवित्र महीना श्रावण केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। आयुर्वेद के अनुसार वर्षा ऋतु में शरीर की पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है और संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। ऐसे समय यदि खान-पान और दिनचर्या में आवश्यक परिवर्तन किए जाएं तो अनेक मौसमी बीमारियों से सहज ही बचा जा सकता है।
छत्तीसगढ़ के ख्यातिप्राप्त आयुर्वेदाचार्य एवं नाड़ीवैद्य डॉ. नागेंद्र नारायण शर्मा ने श्रावण मास के दौरान अपनाई जाने वाली आयुर्वेदिक जीवनशैली पर विस्तार से जानकारी देते हुए कहा कि आयुर्वेद का मूल उद्देश्य स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना और रोगी को रोगमुक्त करना है। इसी कारण आयुर्वेद में ऋतु के अनुसार आहार-विहार अपनाने पर विशेष बल दिया गया है।
उन्होंने बताया कि इस वर्ष श्रावण मास 30 जुलाई से प्रारंभ होकर 28 अगस्त तक रहेगा। इस अवधि में वर्षा ऋतु अपने चरम पर होती है, जिससे वातावरण में नमी, गंदगी और संक्रमण फैलाने वाले जीवाणुओं की संख्या बढ़ जाती है। ऐसे मौसम में शरीर का वात दोष असंतुलित होने लगता है तथा पाचन शक्ति कमजोर पड़ जाती है। यही कारण है कि इस मौसम में पेट संबंधी रोग, त्वचा रोग, जोड़ों का दर्द, गठिया, खुजली, फोड़े-फुंसियां, दस्त, टाइफाइड, मलेरिया और आंखों के संक्रमण जैसी समस्याएं अधिक देखने को मिलती हैं।
डॉ. शर्मा ने कहा कि श्रावण मास में हल्का, ताजा, सुपाच्य और गर्म भोजन करना सबसे अधिक लाभकारी होता है। पुराने चावल, जौ, गेहूं, मूंग की खिचड़ी, लौकी, तोरई, परवल, अदरक, जीरा, मैथी और लहसुन जैसे खाद्य पदार्थ पाचन शक्ति को मजबूत करने के साथ वात दोष को भी संतुलित रखते हैं। उन्होंने विशेष रूप से हरीतकी (हरड़) के सेवन की सलाह देते हुए कहा कि यह पाचन क्रिया को बेहतर बनाती है और शरीर को मौसमी रोगों से बचाने में सहायक होती है।
उन्होंने लोगों को सावन के दौरान पत्तेदार हरी सब्जियों से परहेज करने की सलाह दी। उनके अनुसार अत्यधिक वर्षा के कारण पालक, लाल भाजी, पत्ता गोभी और अन्य पत्तेदार सागों में सूक्ष्म जीवाणु और कीट तेजी से पनपते हैं, जिससे पेट और त्वचा संबंधी रोगों की संभावना बढ़ जाती है। इसी प्रकार बैंगन, मशरूम, उड़द, मटर, मसूर, चना, मोंठ, कटहल, अरबी, आलू, दूध, दही तथा अन्य भारी एवं देर से पचने वाले खाद्य पदार्थों का सेवन भी सीमित या टालना चाहिए। बासी भोजन से भी पूरी तरह बचने की सलाह दी गई।
उन्होंने कहा कि इस मौसम में केवल स्वच्छ और शुद्ध पानी का ही उपयोग करना चाहिए। यदि संभव हो तो पानी को उबालकर या शुद्ध करके ही पीना चाहिए, क्योंकि दूषित जल कई संक्रामक रोगों का कारण बन सकता है।
जीवनशैली में भी करें जरूरी बदलाव
डॉ. नागेंद्र नारायण शर्मा ने बताया कि केवल भोजन ही नहीं, बल्कि दैनिक जीवनशैली भी स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालती है। उन्होंने नियमित रूप से शरीर में तेल की मालिश (अभ्यंग) करने, स्वच्छ एवं हल्के वस्त्र पहनने, नमी वाले स्थानों से बचने तथा बारिश में भीगने पर तुरंत सूखे कपड़े बदलने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि गीली मिट्टी या कीचड़ में नंगे पैर चलने से बचना चाहिए तथा बाहर से घर लौटने पर हाथ-पैर अच्छी तरह धोना आवश्यक है।
उन्होंने यह भी कहा कि श्रावण मास में दिन में अधिक देर तक सोना, देर रात तक जागना, अत्यधिक व्यायाम करना, तेज धूप में अधिक समय बिताना, अत्यधिक शारीरिक श्रम करना तथा अज्ञात नदी या जलाशय में स्नान करना स्वास्थ्य के लिए उचित नहीं माना जाता। साथ ही मच्छरों और कीट-पतंगों से बचाव के लिए मच्छरदानी का उपयोग करें तथा घर के आसपास पानी जमा न होने दें।
डॉ. शर्मा ने कहा कि यदि लोग श्रावण मास में आयुर्वेद द्वारा बताए गए ऋतुचर्या के नियमों का पालन करें, सात्विक एवं सुपाच्य भोजन ग्रहण करें और संतुलित जीवनशैली अपनाएं, तो वे न केवल मौसमी बीमारियों से सुरक्षित रहेंगे बल्कि पूरे वर्ष बेहतर स्वास्थ्य और ऊर्जावान जीवन का आनंद भी ले सकेंगे। उन्होंने सभी लोगों से सावन को केवल धार्मिक अनुष्ठानों का ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य संरक्षण का भी पर्व बनाने का आह्वान किया।


