रसायनों से दूरी, हरियाली से दोस्ती: कोरबा की महिला किसान शांति देवी ने प्राकृतिक खेती से पेश की मिसाल



ढेंचा और मूंग की हरित खाद तकनीक से बढ़ा रही हैं मिट्टी की उर्वरता, कम लागत में बेहतर उत्पादन की दिखाई नई राह।
जवाली की यह पहल प्राकृतिक खेती के क्षेत्र में बनी प्रेरणा, वैज्ञानिक सलाह और जैविक तकनीक से किसानों के लिए तैयार हुआ नया मॉडल।
प्राकृतिक खेती की नई पहचान बना जवाली, महिला किसान शांति देवी की पहल से मृदा संरक्षण और जैविक कृषि को मिली नई दिशा
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**//** कोरबा/कटघोरा, 14 जुलाई। रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम कर प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की दिशा में कोरबा जिले के विकासखंड कटघोरा अंतर्गत ग्राम पंचायत जवाली की महिला कृषक शांति देवी राजपूत ने एक प्रेरणादायी उदाहरण प्रस्तुत किया है। उन्होंने अपनी 3.775 एकड़ कृषि भूमि में ढेंचा और मूंग की हरित खाद तकनीक अपनाकर न केवल मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने का सफल प्रयोग किया है, बल्कि क्षेत्र के किसानों को टिकाऊ और कम लागत वाली खेती का प्रभावी मॉडल भी दिखाया है।

छत्तीसगढ़ शासन द्वारा प्राकृतिक जैविक खेती एवं मृदा स्वास्थ्य संरक्षण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से संचालित कार्यक्रम के अंतर्गत शांति देवी ने आदिवासी सेवा सहकारी समिति मर्यादित जवाली (पंजीयन क्रमांक-3054) से ढेंचा (गुजरात किस्म) एवं मूंग (विराट किस्म) का बीज प्राप्त किया। संपूर्ण तकनीकी मार्गदर्शन ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी (RAEO) मीनाक्षी ठाकुर द्वारा दिया गया।
तकनीकी सलाह के अनुरूप जून माह में वर्षा प्रारंभ होने के बाद खेत की तैयारी कर ढेंचा और मूंग की बुवाई की गई। लगभग 30 से 40 दिनों में फसल के पूर्ण विकसित होने पर उसे खेत में जुताई कर मिट्टी में मिला दिया गया। इस प्रक्रिया से भूमि में प्राकृतिक नाइट्रोजन, जैविक पदार्थ और कार्बनिक तत्वों की मात्रा बढ़ी, जिससे आगामी धान की फसल के लिए खेत पूरी तरह तैयार हो गया।
विशेषज्ञों के अनुसार ढेंचा और मूंग जैसी दलहनी फसलें उत्कृष्ट हरित खाद का कार्य करती हैं। इनकी जड़ों में मौजूद राइजोबियम जीवाणु वायुमंडल की नाइट्रोजन को भूमि में स्थिर कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं। इससे जैविक कार्बन, सूक्ष्म जीवों की सक्रियता, जलधारण क्षमता तथा मिट्टी की संरचना में उल्लेखनीय सुधार होता है। परिणामस्वरूप यूरिया, डीएपी, एसएसपी, पोटाश और एनपीके जैसे रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता काफी कम हो जाती है, जबकि धान सहित अन्य फसलों का उत्पादन अधिक स्वस्थ एवं गुणवत्तापूर्ण होता है।
यह पहल केवल एक किसान की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि प्राकृतिक खेती, पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ कृषि प्रणाली की दिशा में एक मजबूत संदेश है। केंद्र सरकार और छत्तीसगढ़ शासन द्वारा किसानों को प्राकृतिक एवं जैविक खेती अपनाने के लिए लगातार प्रोत्साहित किया जा रहा है, और जवाली की यह पहल उसी अभियान को मजबूती देती नजर आ रही है।
कृषि विभाग के अधिकारियों का मानना है कि यदि किसान वैज्ञानिक सलाह के साथ हरित खाद तकनीक अपनाएं तो कम लागत में अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। शांति देवी का यह प्रयोग पूरे कोरबा जिले ही नहीं, बल्कि प्रदेश के किसानों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन सकता है।
ग्रामीणों और कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ऐसे नवाचार लगातार सामने आते रहे तो भविष्य में प्राकृतिक खेती को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलेगी। जवाली की यह सफलता आने वाले समय में किसानों के लिए एक अनुकरणीय मॉडल सिद्ध हो सकती है और प्राकृतिक खेती के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।


