August 14, 2026

त्रिनेत्र टाईम्स

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25 लाख के चेक बाउंस मामले में बैंक को बड़ी कानूनी जीत, आरोपी की अपील खारिज

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द्वितीय अपर सत्र न्यायालय का महत्वपूर्ण फैसला — दोषसिद्धि और 2 वर्ष की सजा बरकरार, वरिष्ठ अधिवक्ता धनेश कुमार सिंह की प्रभावी पैरवी रंग लाई
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**// कोरबा। चेक अनादरण (चेक बाउंस) प्रकरण में छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक को बड़ी कानूनी सफलता मिली है। द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश कोरबा माननीय डॉ. ममता भोजवानी की अदालत ने दाण्डिक अपील क्रमांक 44/2026 संजय ओगरे बनाम छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी द्वारा प्रस्तुत अपील को खारिज कर दिया है। न्यायालय ने विचारण न्यायालय द्वारा सुनाई गई दोषसिद्धि एवं सजा को पूरी तरह यथावत कायम रखा है।
प्रकरण धारा 138 परक्राम्य लिखत अधिनियम (एन.आई. एक्ट) के अंतर्गत दर्ज किया गया था, जिसमें आरोपी संजय ओगरे पर बैंक के प्रति वैध देनदारी के भुगतान हेतु जारी चेक के अनादरण का आरोप था। मामले की सुनवाई के बाद विचारण न्यायालय ने आरोपी को दोषी करार देते हुए 2 वर्ष के सश्रम कारावास एवं ₹25 लाख की प्रतिकर राशि/अर्थदंड से दंडित किया था। साथ ही आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया था कि अर्थदंड अदा नहीं करने की स्थिति में आरोपी को अतिरिक्त 6 माह का सश्रम कारावास भुगतना होगा।
विचारण न्यायालय के इस फैसले को आरोपी द्वारा अपीलीय न्यायालय में चुनौती दी गई थी। आरोपी पक्ष ने दोषसिद्धि एवं दंडादेश को निरस्त करने की मांग की, लेकिन अपीलीय न्यायालय ने मामले के दस्तावेजी साक्ष्यों, बैंकिंग अभिलेखों एवं प्रस्तुत विधिक तथ्यों का परीक्षण करने के बाद आरोपी के सभी तर्कों को अस्वीकार कर दिया।
माननीय न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा कि आरोपी द्वारा विधिक दायित्व के निर्वहन के लिए जारी किया गया चेक अनादरित हुआ था तथा विधिक नोटिस प्राप्त होने के बावजूद भुगतान नहीं किया गया। इस आधार पर न्यायालय ने माना कि आरोपी के विरुद्ध धारा 138 एन.आई. एक्ट का अपराध पूर्ण रूप से प्रमाणित होता है।
इस चर्चित प्रकरण में छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता धनेश कुमार सिंह ने प्रभावी और मजबूत पैरवी की। उन्होंने न्यायालय के समक्ष मामले के विधिक एवं तथ्यात्मक पक्षों को बेहद सशक्त ढंग से प्रस्तुत किया, जिसके परिणामस्वरूप बैंक के पक्ष में विचारण न्यायालय द्वारा पारित निर्णय को अपीलीय न्यायालय ने भी बरकरार रखा।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला वित्तीय लेन-देन में पारदर्शिता और भरोसे को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है। न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि धारा 138 परक्राम्य लिखत अधिनियम का मुख्य उद्देश्य वित्तीय व्यवहारों में विश्वास बनाए रखना और वैध देनदारियों के भुगतान को सुनिश्चित करना है।
इस फैसले के बाद बैंकिंग और वित्तीय मामलों से जुड़े लोगों के बीच यह संदेश गया है कि चेक जारी करने के बाद भुगतान से बचने का प्रयास कानून की नजर में गंभीर अपराध है और ऐसे मामलों में न्यायालय सख्त रुख अपनाने से पीछे नहीं हटेगा।

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