त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ***//** कोरबा नगर पालिक निगम कोरबा में लंबे समय से लंबित भुगतानों को लेकर अब ठेकेदारों का सब्र जवाब देने लगा है। विभिन्न निर्माण कार्यों को समय पर पूर्ण करने के बावजूद महीनों—यहां तक कि एक वर्ष तक—भुगतान न मिलने से ठेकेदारों के सामने आर्थिक संकट गहराता जा रहा है। इस गंभीर स्थिति को लेकर ठेकेदारों ने निगम आयुक्त से शीघ्र भुगतान की मांग करते हुए मुलाकात का समय भी मांगा है।
जानकारी के अनुसार, निगम द्वारा जारी निविदाओं के तहत ठेकेदारों ने पार्षद मद, अधोसंरचना मद, डीएमएफ, विधायक निधि, सांसद निधि एवं प्रभारी मंत्री मद सहित विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत निर्माण कार्य पूरे किए हैं। लेकिन कार्य पूर्ण होने के बाद भी भुगतान में लगातार हो रही देरी ने पूरे ठेकेदार वर्ग को परेशान कर दिया है।
ठेकेदारों का कहना है कि 6-6 महीने से लेकर सालभर तक भुगतान लंबित रहने के कारण वे गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं। मजदूरों का भुगतान, सामग्री सप्लायरों का बकाया और अन्य व्यापारिक दायित्वों का निर्वहन करना उनके लिए कठिन होता जा रहा है। कई मामलों में व्यापारी वर्ग ने उधारी में सामग्री देना भी बंद कर दिया है, जिससे नए कार्यों को शुरू करना या समय पर पूरा करना मुश्किल हो रहा है।
स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि कुछ ठेकेदारों को अपने परिवार के भरण-पोषण में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। उनका कहना है कि यदि लगाए गए पैसे का समय पर “रोलिंग” नहीं होगा, तो वे भविष्य में निगम के कार्यों में भाग लेने में असमर्थ हो जाएंगे, जिसका सीधा असर शहर के विकास कार्यों पर पड़ेगा।
ठेकेदारों ने आरोप लगाया है कि निगम की अकाउंट शाखा द्वारा राज्य सरकार को भुगतान प्रक्रिया में आवश्यक कार्रवाई समय पर नहीं की जाती, जिससे अनावश्यक देरी होती है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि अनुबंध नगर निगम से होता है, इसलिए भुगतान की जिम्मेदारी भी निगम की ही बनती है।
इस पूरे मामले को लेकर ठेकेदारों ने निगम आयुक्त से मांग की है कि सभी लंबित भुगतानों को प्राथमिकता के आधार पर जल्द से जल्द जारी किया जाए। साथ ही उन्होंने सामूहिक रूप से आयुक्त से मुलाकात कर अपनी समस्याओं को विस्तार से रखने की इच्छा भी जताई है।
गौरतलब है कि इससे पहले भी इस तरह की बैठक का आयोजन किया जा चुका है, लेकिन ठोस समाधान नहीं निकलने से ठेकेदारों में असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है।
अब देखना यह होगा कि निगम प्रशासन इस बढ़ते असंतोष को कितनी गंभीरता से लेता है और ठेकेदारों को राहत दिलाने के लिए कितनी जल्दी ठोस कदम उठाता है।