ऊर्जा नगरी कोरबा ज़हरीली हवा की गिरफ्त में: PM-2.5 और PM-10 ने बढ़ाया मौत का खतरा वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर पर, प्रशासन और उद्योगों की भूमिका पर सवाल






पर्यावरण विभाग मौन क्यों? कहीं मिलीभगत तो नहीं?
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ****//** कोरबा छत्तीसगढ़ की “ऊर्जा नगरी” कोरबा आज विकास की नहीं, बल्कि ज़हरीली हवा और गहराते स्वास्थ्य संकट की पहचान बनती जा रही है। जिले में लगातार बढ़ता वायु प्रदूषण अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह जनस्वास्थ्य आपातकाल का रूप ले चुका है।
स्थानीय नागरिकों, पर्यावरण विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि स्थिति पर तत्काल और सख्त नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में कोरबा बीमारियों की राजधानी बन सकता है।
देश की ऊर्जा ज़हरीली हवा की कीमत पर?
कोरबा देशभर में बिजली उत्पादन का बड़ा केंद्र है। जिले में
एनटीपीसी कोरबा सुपर थर्मल पावर स्टेशन,
हसदेव थर्मल पावर स्टेशन,
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी थर्मल पावर स्टेशन,
अडानी कोरबा पावर लिमिटेड,
बालको एल्यूमिनियम प्लांट,
जैसे कई बड़े कोयला आधारित उद्योग संचालित हैं।
इसके साथ ही बांगो हाइड्रो इलेक्ट्रिक पावर स्टेशन भी स्थित है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या देश की ऊर्जा जरूरतों की कीमत कोरबा के लोगों की सेहत से चुकाई जा रही है?
PM-2.5 और PM-10: हवा में घुला धीमा ज़हर
पर्यावरण एवं स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार कोरबा की हवा में PM-2.5 और PM-10 जैसे सूक्ष्म प्रदूषक कण खतरनाक स्तर तक पहुंच चुके हैं।
ये कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि सीधे फेफड़ों और रक्त प्रवाह में प्रवेश कर जाते हैं।
संभावित दुष्परिणाम:
दमा और सांस की गंभीर बीमारियां
हृदय रोग
त्वचा रोग
बच्चों में फेफड़ों का कमजोर विकास
कैंसर का बढ़ता खतरा
स्वास्थ्य मानकों के अनुसार PM-2.5 यदि 50 माइक्रोग्राम/घन मीटर से अधिक हो, तो बच्चों और बुजुर्गों के लिए बाहर निकलना खतरनाक माना जाता है।
कोरबा में कई बार यह स्तर इससे कई गुना अधिक दर्ज किया जा चुका है — लेकिन सवाल है, कार्रवाई कहां है?
प्रशासनिक सख्ती क्यों नदारद?
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि प्रदूषण नियंत्रण को लेकर प्रशासनिक इच्छाशक्ति कमजोर दिखाई देती है।
जब भी इस मुद्दे पर आवाज उठाई जाती है—
कभी इसे राजनीतिक बताया जाता है
कभी व्यक्तिगत एजेंडा कहकर खारिज कर दिया जाता है
स्वास्थ्यकर्मी बच्चों और बुजुर्गों को घर में रहने की सलाह दे रहे हैं, लेकिन
👉 रोज़गार
👉 स्कूल
👉 दैनिक जीवन
इन सबके कारण आम लोग ज़हरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं।
सिर्फ जुर्माना काफी है या सख्त सजा जरूरी?
नागरिकों और सामाजिक संगठनों का सीधा सवाल है—
“यदि एक व्यक्ति के अपराध पर कठोर सजा हो सकती है, तो लाखों लोगों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर केवल आर्थिक जुर्माना क्यों?”
मांग की जा रही है:
निरंतर और पारदर्शी प्रदूषण निगरानी
प्रदूषण फैलाने पर भारी जुर्माना + संचालन पर रोक
आधुनिक तकनीक अनिवार्य
उल्लंघन पर कानूनी कार्रवाई
पर्यावरण विभाग की भूमिका पर बड़ा सवाल
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि—
पर्यावरण विभाग क्या कर रहा है?
क्या नियमित जांच हो रही है?
क्या वास्तविक आंकड़े सार्वजनिक किए जा रहे हैं?
क्या उद्योगों पर समान कार्रवाई हो रही है?
नागरिकों के बीच यह चर्चा तेज हो रही है कि
कहीं पर्यावरण विभाग और प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों के बीच कोई मिलीभगत तो नहीं?
हालांकि यह एक गंभीर सवाल है, जिसका जवाब संबंधित विभागों को सार्वजनिक रूप से देना चाहिए।
न्यायपालिका से जगी उम्मीद
पर्यावरण संरक्षण की दिशा में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय द्वारा कोरबा में फ्लाई ऐश डंपिंग पर रोक को एक महत्वपूर्ण और साहसिक कदम माना जा रहा है।
इस फैसले से यह उम्मीद जगी है कि आने वाले समय में—
वायु प्रदूषण
औद्योगिक लापरवाही
पर भी न्यायिक सख्ती देखने को मिल सकती है।
स्थायी समाधान नहीं तो आंदोलन तय
कोरबा के नागरिकों और सामाजिक संगठनों का स्पष्ट कहना है कि—
पहले प्रशासन
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
और उद्योग प्रबंधन
मिलकर ठोस और समयबद्ध कार्ययोजना बनाएं।
यदि इसके बाद भी हालात नहीं सुधरते, तो
👉 न्यायिक हस्तक्षेप
👉 जन आंदोलन
का रास्ता अपनाने से पीछे नहीं हटेंगे।
प्रश्न यही है—
क्या कोरबा के लोग सिर्फ बिजली पैदा करने की कीमत अपनी सेहत और जीवन से चुकाते रहेंगे?
या फिर प्रशासन, जनप्रतिनिधि और उद्योग मिलकर इस गंभीर पर्यावरणीय संकट का स्थायी समाधान निकालेंगे?
ऊर्जा नगरी कोरबा की हवा साफ होगी या सवालों में घुटती रहेगी—जवाब अब जरूरी है।





