“आज से सत्तू”: परंपरा, स्वास्थ्य और संस्कृति से जुड़ी अद्भुत कहावत का रहस्य




त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ****/ कोरबा/रायपुर। गर्मियों की शुरुआत होते ही छत्तीसगढ़ समेत उत्तर भारत के कई हिस्सों में एक खास शब्द सुनाई देता है – “आज से सत्तू”। यह न सिर्फ एक कहावत बन चुकी है, बल्कि एक मौसम, संस्कृति और जीवनशैली का प्रतीक भी है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस कहावत के पीछे की असली वजह क्या है? क्यों हर साल चैत्र माह के अंत या बैसाख की शुरुआत में लोग कहते हैं – “आज से सत्तू”?
परंपरा की जड़ें
“आज से सत्तू” कहे जाने का सीधा संबंध ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत से है। भारतीय पंचांग के अनुसार, बैसाख माह (अप्रैल-मई) में सूर्य की तीव्रता बढ़ जाती है और गर्मी अपने चरम पर होती है। इस समय शरीर को ठंडक, ऊर्जा और पोषण की आवश्यकता होती है। यही वह समय होता है जब सत्तू – जोकि भुने हुए चने, जौ या मक्का का आटा होता है – खानपान में शामिल किया जाता है।
स्वास्थ्य का खजाना
सत्तू न केवल परंपरागत पेय है, बल्कि आयुर्वेदिक दृष्टि से अत्यंत लाभकारी भी है। यह शरीर को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखता है, पाचन को सुधारता है, ऊर्जा प्रदान करता है और लू से बचाने में मदद करता है। विशेष रूप से खेतों में काम करने वाले किसान, मज़दूर और ग्रामीण क्षेत्रों के लोग इस मौसम में सत्तू का सेवन करते हैं।
“आज से सत्तू” – मौसम का संकेतक
जब पहली बार गर्म हवाएँ (लू) चलने लगती हैं और धूप का तीखापन बढ़ जाता है, तब लोग यह कहावत कहते हैं – “आज से सत्तू”। यह कहावत दरअसल इस बात की सूचना भी होती है कि अब मौसम पूरी तरह बदल चुका है और शरीर को भी उस अनुसार ढालने की ज़रूरत है।
ग्रामीण और शहरी दोनों में समान महत्व
हालांकि यह परंपरा अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक प्रचलित रही है, लेकिन आजकल शहरी जीवन में भी सत्तू की लोकप्रियता बढ़ रही है। स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोग अब इसे सुपरफूड मानकर गर्मियों में सत्तू शरबत, सत्तू पराठा, या लड्डू के रूप में अपनाने लगे हैं।
सामाजिक और पारिवारिक परंपरा
कुछ क्षेत्रों में “आज से सत्तू” कहे जाने के दिन विशेष तौर पर घरों में सत्तू बनाया और बाँटा जाता है। यह परिवार के बुज़ुर्गों द्वारा बच्चों को यह सिखाने का भी ज़रिया होता है कि हमारे खानपान और स्वास्थ्य का मौसम से गहरा रिश्ता होता है।
निष्कर्ष:
“आज से सत्तू” महज एक कहावत नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की उस गहराई को दर्शाती है जहाँ मौसम के साथ खानपान और स्वास्थ्य को जोड़कर देखा गया है। यह कहावत हमें हमारे पूर्वजों की जीवनशैली और मौसम अनुसार खानपान की समझ की याद दिलाती है।


