वक़्त की रफ्तार में पीछे छूट गया तांगा, मोटर-कारों ने छीना रोज़गार



ऑटो, टैक्सी और कारों की दौड़ में तांगे का अस्तित्व हुआ ख़त्म
(विशेष लेख – कमलज्योति)
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ****/ कभी सड़कों पर शान से दौड़ते तांगे, जिनकी घंटियों की टन-टन और घोड़ों की टापों की आवाज़ लोगों के सफर का अहसास कराती थी, अब सिर्फ़ यादों का हिस्सा बनकर रह गई है। “चल धन्नो… चल टाइगर… चल मेरे राजा…” जैसे शब्द, जो तांगेवालों के मुंह से सुनने को मिलते थे, अब सुनाई देना बंद हो गए हैं। मशीनों और मोटर-कारों की तेज़ी ने इस पुराने और ऐतिहासिक सफर को पीछे छोड़ दिया है।
एक दौर था जब तांगे की थी सड़कों पर बादशाहत
कभी गांवों की तंग गलियों से लेकर बड़े शहरों तक, तांगे ही यातायात का मुख्य साधन हुआ करते थे। मुसाफ़िरों को मंज़िल तक पहुँचाने का यही सबसे किफायती और आरामदायक तरीका था। लेकिन जैसे-जैसे वक़्त बदला, तकनीक का विकास हुआ, मोटर-कारों, टैक्सियों, बसों और ऑटो-रिक्शों ने तांगे के पहियों को थाम दिया।
तांगा सिर्फ़ एक सवारी नहीं, बल्कि संस्कृति और परंपरा का हिस्सा भी था। शादी-ब्याह, धार्मिक यात्राओं से लेकर आम जिंदगी में भी तांगे की अहमियत थी। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में लोगों को जल्द से जल्द मंज़िल तक पहुँचना है, और तांगे की धीमी चाल अब इस दौड़ में फिट नहीं बैठती।
बॉलीवुड फिल्मों में भी तांगे ने बनाई थी खास जगह
तांगे की लोकप्रियता सिर्फ़ सड़कों तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि फिल्मों में भी इसका ख़ास स्थान था।
- फ़िल्म “शोले” में बसंती का तांगा और उसकी घोड़ी धन्नो आज भी लोगों की यादों में बसी हुई है।
- “नया दौर” में दिलीप कुमार ने मोटर से रेस लगाकर तांगे की शान को बचाने की कोशिश की थी।
- फ़िल्म “हावड़ा ब्रिज”, “तांगे वाला”, “मर्द” जैसी फिल्मों में भी तांगे ने अहम भूमिका निभाई।
लेकिन असल जिंदगी में तांगा इस रेस को हार चुका है।
पर्यावरण के लिए बेहतर था तांगा
अगर देखा जाए तो तांगा पर्यावरण के लिए फायदेमंद था। न धुआं, न प्रदूषण, न ट्रैफिक का शोर… बल्कि एक धीमा और शांत सफर, जिसमें सफर करने वालों के बीच अपनापन भी झलकता था। लेकिन बदलते दौर ने तांगे को सड़कों से गायब कर दिया।
छत्तीसगढ़ में भी खत्म हो गया तांगे का जमाना
छत्तीसगढ़ में भी तांगे की एक अलग पहचान थी। रायपुर, दुर्ग-भिलाई, बिलासपुर, जांजगीर-चांपा और कोरबा जैसे शहरों में तांगे प्रमुख यातायात का साधन हुआ करते थे। रेलवे स्टेशनों और बस स्टैंड के बाहर ऑटो और टैक्सियों की जगह तांगे खड़े होते थे।
92 वर्षीय ओंकार सिंह ठाकुर बताते हैं कि कोरबा में पुराने बस स्टैंड से स्टेशन तक तांगे चलते थे। स्टेशन से बालको तक भी दो तांगे चलाए जाते थे। लेकिन आज यह सब सिर्फ़ यादों का हिस्सा बनकर रह गया है।
जांजगीर-चांपा जिले के शिवरीनारायण में तांगा चलाने वाले अयोध्या प्रसाद बताते हैं कि –
“मैं पिछले 26 सालों से तांगा चला रहा हूँ, लेकिन अब मुश्किल से कमाई होती है। लोग मोटर-कारों से जल्दी पहुँचना चाहते हैं, इसलिए तांगा का व्यवसाय खत्म होने के कगार पर है।”
नए ज़माने के साथ पीछे छूट गया तांगा
आज बुलेट ट्रेन के सपने देखने वाली दुनिया में तांगा अब सिर्फ़ इतिहास का हिस्सा बन गया है। मोटर-कारें बताती हैं कि वे एक लीटर पेट्रोल में कितनी दूर जाएंगी, लेकिन काश यह करामात घोड़ों और घोड़ियों को भी आती, तो शायद तांगे भी इस दौड़ में बने रहते।
अब सिर्फ़ किसी उत्सव, मेले या ऐतिहासिक पर्यटन स्थलों पर ही तांगे दिखाई देते हैं, और शायद आने वाले समय में ये भी सिर्फ़ किताबों और फिल्मों में ही देखने को मिलें।
– विशेष लेख: कमलज्योति




